विदेशी कलम से भारत गाथा

म कौन थे? हम क्या हैं? जब तक इन प्रश्नों के उत्त हम अपने भीतर नहीं तलाश लेते तब तक न तो हम अपनी शक्ति को पहचान पाएंगे और न ही पूरी ताकत के साथ अपना ‘श्रेष्ठ’ दिखा पाएंगे। कई बार हम अपनी ताकत को खुद न पहचान कर दूसरों की नजरों से आंकते हैं। जब हम राष्ट्रवाद की बाद बात करते हैं तो उसका सीधा सम्बन्ध राष्ट्र प्रेम से है। राष्ट्र प्रेम के लिए आवश्यक है की राष्ट्र के प्रति हमारे मन में स्वाभिमान का भाव हो। लेकिन दुर्भाग्य की बात है कि हम अपने राष्ट्र पर गर्व करना भूल चुके हैं। एक लम्बे अरसे से अपने देश को नीचा, पिछड़ा हुआ घोषित करने का एक फैशन सा चल पड़ा है। जबकि हमारा देश एक ठोस ध् ारातल पर खड़ा है। अब जरा भारत की संस्कृति, सभ्यता और ज्ञान को ही लें, बहुतों को लगता है कि यहाँ सब कुछ दोयम दर्जा का है, पश्चिम देशों में जो कुछ है वही श्रेष्ठ है। या जो पश्चिम से आये वही श्रेष्ठ है। लेकिन सच ऐसा नहीं है। फिर भी अगर हमारी कही पर यकीन नहीं कि हम ऐसे देश के वासी है जिस पर हमें स्वाभिमान होना चाहिए तो आइये पश्चिम की नजर से ही खुद को देखते हैं।
पिछले दिनों मेरी नजर एक किताब पर गई। शीर्षक था ‘व्हाट इज इंडिया- नो द आन्सर्स फ्राॅम द वल्र्ड रिनोंड इंटेलेक्चुअल जाइंट्स’। पश्चिमी देशों की महान विभूतियाँ भारत को किस तरह से देखती हैं, भारत के बारे में क्या सोच रखती हैं, जब पढ़ा तो एक कहावत याद आ गई-दिया तले अँधेरा।
जर्मन दार्शनिक मेक्समूलर कहते हैं -‘‘अगर मुझसे पूछा जाये दुनिया में सबसे अमीर देश कौन सा है जिसके पास अकूत धन सम्पत्ति है, शक्ति है, प्रकृति ने अपने सौंदर्य का खजाना जिस पर लुटाया है, तो धरती पर स्वर्ग जैसा हो तो मुझे भारत का नाम लेना चाहिए। अगर कोई मुझसे पूछे वह कौन सा खुला आसमान हैं जिसके नीचे मानव मस्तिष्क ने सबसे ज्यादा विकास किया और जीवन की सबसे मुश्किल गुत्थियों को सुलझाया, जिसकी तरफ देखे बिना पश्चिम के दार्शनिकों प्लेटो और कान्ट से भी न रहा गया-तो मुझे भारत का नाम लेने चाहिये। अगर मैं अपने आप से पूछूं कि पूरी दुनियां में किस साहित्य में अपने आंतरिक जीवन को पूर्ण बनाने, ज्यादा यूनिवर्सल बनाने, सही मायनों में इन्सान बनाने की बात कही गयी है तो एक बार फिर से भारत की ओर इशारा करूंगा। ‘वे आगे कहते हैं-‘अपने अध्ययन के लिए आप अपनी मानव बुद्धि को किसी भी दिशा में दौड़ाएं चाहे वह धर्म हो, पौराणिक शास्त्र हों या दर्शन, कानून हो या संस्कृति, प्रिमिटिव आर्ट हो या प्रिमिटिव साइंस-आप चाहें या न चाहें आपको भारत कि तरफ देखना ही होगा। क्योंकि सबसे कीमती और सबसे ज्यादा ज्ञान का खाजाना भारत में है, सिर्फ भारत में।’’
आपने परमाणु बम के पिता कहे जाने वाले जूलियस आर. ओपेन्हाईमर क नाम जरूर सुना होगा। वे कहते हैं – आज हम जो कुछ मेटा फिजिक्स में देखते हैं, वह प्राचीन भारतीय बुद्धि का ही बेहतरीन उदाहरण और परिवर्द्धित (रिफाइन्ड) रूप है।’’

महान अमरीकी कवि, समीक्षक, दार्शनिक और नोबल पुरूस्कार पाने वाले टी. एस. इलियट जब कहते हैं कि ‘‘भारतीय दार्शनिकों कि सूक्ष्म दृष्टि के सामने गयी यूरो के दार्शनिक स्कूली बच्चों जैसे है। ’’तो हमारा मन अपने अतीत में झँाकने का होता है। अपनी संस्कृति, सभ्यता को नमन कने का मन होता है। जानते हैं विश्व के सबसे महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आईन्स्टाईन भारतीय मेघा को परनाम करते हुए क्या कहा था? ‘‘हम उन भारतियों को प्रणाम करते हैं जिन्होने हमे गिनती करना सिखाया, जिसके बिना कोई भी वैज्ञानिक खोज संभव नहीं हो पाती है।’’ वेव मेकेनिक्स के लए नोबल पुरूस्कार पाने वाले आॅस्ट्रिया के भौतिक शास्त्री और क्वांटम फिजिक्स के जनक इर्विन श्रोडिन्गर ने यहाँ तक कहा कि ‘‘पश्चिमी विज्ञान को स्प्रिचुअल एनीमिया से बचने के लिए पश्चिम को पूर्व से ब्लड ट्रांस्फ्सजल की जरूरत है।’’ कोई तो ऐसी बात है भारत में कि जिसे देखकर प्रो. हिरेन ने कहा है-‘‘भारत एक ऐसा देश है जहाँ से न केवल बाकी एशिया बल्कि पूरी पश्चिमी दुनिया अपना अपने ज्ञान और धर्म के स्रोत के रूप में देखती है।’’
फ्रासिसी लेखक और दार्शनिक फ्रांस्वा वोल्तेयर ने सीधे-सीधे भारत का नाम न ले कर गंगा का उल्लेख करते हुए कहा-‘‘मेरा मानना है कि हमारे पास जो कुछ आया है वह गंगा के किनारों से आया है-चाहे वह एस्ट्रोनोमी (खगोल शास्त्र) हो या एस्ट्रोलोजी (ज्योतिषशास्त्र) या फिर अध्यात्म।’’ वे एक और रहस्य खोलते है-‘‘यह जानना जरूरी है कि कोई 2,500 साल पहले पाइथागारस समस से चल कर गंगा तक आया था ज्योमेट्री सीखने के लिए।’’ जिस गंगा के देश ने पाइथागोरस और दुसरे वैज्ञानिकों, गणितज्ञों, विद्वानों और दार्शनिकों को आकर्षित किया उसी गंगा के देश में रहते हुए आज हम अपनी ओर देखना क्यों भूल गए? क्यों अपनी संस्कृति, अपनी धरोहर, अपनी ज्ञान सम्पदा की ओर से मुंह मोड़ कर बैठ गए? यह सवाल बार-बार जेहन में कौंधता है। कौधना भी चाहिए क्योंकि जब हम सवाल नहीं करेंगे तो उत्तर कि खोज में कैसे निकलेंगे? कहा भी गया है-जिन खोजा आतीं पाइया’।
डाॅ0      विनीता   गुप्ता

लेखिका   महाराजा अग्रसेन इस्टीट्यूट    आॅफ   मैनेजमेंट स्टडीज, गुरू गोबिंद सिंह इन्द्रप्रस्थ  विश्वविद्यालय,  दिल्ली में   पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग  में   एसोसिएट प्रोफेसर है।

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