राष्ट्रवाद

भारत की किसी भाषा में नैशनलिजम का समानार्थक शब्द है ही नहीं। भारत में जो शब्द है वह है राष्ट्र और राष्ट्रभाव। राष्ट्रभाव का अंग्रेजी मे ठीक अनुवाद नहीे है। जो परम्परायें, जो विषय, जो शब्द पाश्चात्य जगत् के साहित्य मे हैं, वे यहां के जीवन चलन में नहीं हैं।अथर्ववेद के एक मंत्र में भारतीय राष्ट्रवाद के प्रति जो भाव है वह इस प्रकार है-
माता भूमि पुत्रोअहम् प्रतिव्याह ।।
अर्थात् पृथ्वी मेरी माता है और मैें इसका पुत्र हूं।
जिस भूमि पर हम रहते हैं उससे मातृवत लगाव की यह भावना हमारी संस्कृति में हजारों साल पुरानी है। मातृभूमि से लगाव राजनीतिक नहीं है, बाध्यकारी नहीं है। ये उस भूमि के प्रति कृतज्ञता है जो हमारा पोषण करती है, हमारे लिए कल्याणकारी है और इसीलिए हमारी माता के समान है। ये कृतज्ञता, ये लगाव हमारे संस्कारों का हिस्सा है, हमारी संस्कृति का अंग है।
कुछ राजनीतिक दल, जिन्होंने “राष्ट्रवाद“ के मुद्दे को खासतौर से हवा दी है, वो इसे सरकार पर हमला करने के एक सुनहरे मौके के रूप में देख रहे हैं। ये उनके लिए एक अवसर है अपनी विचारधारा का प्रचार करने का, अपनी विचारधारा को सही साबित करने का, उस नेरेटिव को फिर से प्रचलन में लाने का जिसे उन्होंने आजादी के बाद बड़े जतन से पाला पोसा और बड़ा किया है। उनका यह नेरेटिव मूल रूप से राजनीति विज्ञान की पश्चिमी अवधारणाओं पर आधारित है।
दूसरी और सरकार के लिए यह मौका है उन ऐतिहासिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक आदि तथ्यों कोे अपने तरीके से पेश करने का जिन्हें अब तक एक खास मकसद से एक खास नजरिए से ही पेश किया जाता रहा है।
मैं एक शिक्षाविद् हूं और व्यवसायी भी। मेरे लिए राष्ट्रवाद राजनीतिक लड़ाई का मुद्दा नहीं है और सत्ता पर कब्जे के लिए धार्मिक मतभेदों को भड़काने का तो बिल्कुल भी नहीं।
मेरे माता-पिता बहुत ही उदार और प्रगतिशील सोच रखते थे। मैं लड़की थी लेकिन उनके लिए मेरी शिक्षा-दीक्षा, संस्कार और करियर मेरे भाइयों जितने ही महत्वपूर्ण थे। लेकिन अपने बच्चों से भी अधिक उनके लिए महत्वपूर्ण थे देश के प्रति वफादारी और ईमानदारी। उनके लिए देश सिर्फ धरती का एक टुकड़ा नहीं था। उनके लिए देश एक ऐसी भावना थी जिसके लिए वो अपना सर्वस्व कुर्बान कर सकते थे। उन्होंने हमें अपने अधिकारों के प्रति सचेत तो बनाया ही, साथ ही यह भी सिखाया कि देश और समाज के प्रति हमारे क्या कर्तव्य हैं। अगर हम इस देश से कुछ ले रहे हैं तो इसे कुछ लौटाएं भी।
देश के प्रति कृतज्ञता, समर्पण और कुछ कर गुजरने का जज्बा। मेरे लिए राष्ट्रवाद का यह पहला और मौलिक पाठ है। मेरे लिए राष्ट्रवाद एक संस्कार है, राजनीतिक मसला नहीं। यह कोई नई अवधारणा नहीं है। मैं यहां आपको अथर्व वेद का वो मंत्र फिर से याद दिला दूं जिसका उल्लेख मैंने आरंभ में किया था – माता भूमि पुत्रोअहम् प्रतिव्याह।
अगर हम देश से प्यार करते हैं और उसके लोगों का सम्मान करते हैं तो इसका मतलब ये नहीं कि हम इसकी मिट्टी को रोज हल्दी चंदन से पूजें या इसके लोगों के लिए भजन कीर्तन करें। मेरे लिए देश से प्यार करने का मतलब सिर्फ यही है कि मैं अपनी सामथ्र्य के अनुसार जितने लोगों का भला कर सकूं करूं, जितने लोगों के सुख दुख बांट सकूं बांटूं। मेरे लिए राष्ट्रवाद का अर्थ है देश के लोगों की सेवा।
मेरे लिए देशभक्ति और राष्ट्रवाद कोई दिखावा नहीं, ये मेरी मूक प्रार्थनाओं और दुआओं हिस्सा हैं।
मैंने राष्ट्रवाद पर बड़ी बड़ी बहसें सुनी हैं और टीवी पर देखी हैं। हमने इसे सिर्फ राजनीतिक विमर्श तक सीमित कर दिया है। पोलिटिकल साइंटिस्ट और एनालिस्ट इस पर शब्दों के अंबार लगा रहे हैं। मेरे लिए राष्ट्रवाद का सीधा सा अर्थ है अपनी धरती से जुड़ाव और उसके लिए कुछ कर गुजरने की भावना। मेरे लिए देशभक्ति और राष्ट्रवाद एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।
यह सही है कि देश से जुड़ाव या देशभक्ति के लिए आर्थिक संपन्नता जरूरी नहीं है और ये भी जरूरी नहीं है कि सभी संपन्न व्यक्ति देशभक्त हों हीं। देशभक्ति एक ऐसी भावना है जो हमारे देशवासियों को पीढ़ी दर पीढ़ी पारिवारिक संस्कारों में मिली है। यह देश के प्रति हमारे लोगों का प्रेम ही है जिसके कारण हर भड़कावे, विकृति, और दुष्प्रचार के बावजूद केरल से कश्मीर तक और गुजरात से पश्चिम बंगाल तक हम एक है और एक रहेंगे। मेरे विचार से अगर स्वतंत्र भारत की सबसे बड़ी कोई उपलब्धि है तो वो ये है कि सारी राजनीतिक, भौगोलिक, भाषायी विषमताओं के बावजूद आज सवा सौ करोड़ लोग भारत को अपना देश मानते हैं और खुद को शान से भारतवासी।
भारतवर्ष आजादी से पहले आधुनिक अर्थ में भले ही एकीकृत राष्ट्रराज्य न रहा हो, लेकिन सांस्कृतिक दृष्टि से यह सदैव अखंड इकाई रहा है। आज भी जब हम कोई पूजा-अनुष्ठान शुरू करने से पहले संकल्प लेते हैं तो जिस मंत्र का उच्चारण करते हैं उसमें जम्बूद्वीपे….भारतवर्षे…भारतखंडे आता है कि नहीं? हमारे लिए तो किसी अनुष्ठान का संकल्प भी अपने देश को याद किए बिना पूरा नहीं होता। हमारे लिए तो देश सांस्कृतिक ही नहीं आध्यात्मिक आइडेंटिटी भी है। इसलिए राष्ट्रवाद हमारे लिए देश की आत्मा की अभिव्यक्ति है।
शायद यही वजह है कि लोगों ने सदैव ही राष्ट्रीय अस्मिता को क्षेत्रीय गौरव से ऊपर माना है। देश में चाहे कितने ही राजे-रजवाड़ें रहे, लोगों ने हमेशा खुद का भारतीय ही माना। हमारी आजादी की लड़ाई खुद इसे सत्यापित करती है जिसमें देश के हर हिस्से से लोगों ने अखंड भारत के लिए लड़ाई लड़ी। दुखद बात तो ये है कि कई तथाकथित आधुनिक राजनीतिक विचारधाराएं इसे क्षुद्र राजनीतिक और सांप्रदायिक स्वार्थों के लिए स्वीकार ही नहीं करती।
इसमें कोई शक नहीं कि आजादी की लड़ाई ने भारतीय राष्ट्रवाद में एक नयी ऊर्जा का संचार किया। लोगों ने अपनी भावनाओं और सपनों में बसे भारत कोे वास्तविकता में ढालने का सपना देखा। लेकिन तत्कालीन अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों में, खासतौर से यूरोप में विकसित हुए विस्तारवादी और उग्रवादी राष्ट्रवाद के कारण तबके प्रमुख भारतीय नेताओं ने राष्ट्रवाद के इस भारतीय उभार को सिेरे से नकार दिया और उसे वो महत्व नहीं मिला जो मिलना चाहिए था।
आज फिर मौका है कि हम भारतीय राष्ट्रवाद को विशुद्ध भारतीय परिप्रेक्ष्य में फिर से समझने की कोशिश करें। राष्ट्रवाद का जो अर्थ यूरोप या अमेरिका में है, जरूरी तो नहीं कि वही भारत में भी हो। वैसे भी भारत के सामाजिक और सांस्कृतिक इतिहास और चेतना यूरोप से भिन्न रहे हैं। आज भी हमारी राजनीति और लोगों की सांच वहां से बिल्कुल अलग है। जरूरी है कि हम यह भी समझें कि पश्चिमी राजनीतिक शब्दावली को न तो हम भारतीय संदर्भ में हू-ब-हू अपना सकते हैं और न ही उनका भारतीय भाषाओं में अनुवाद कर सकते हैं। भाषाएं और विचार समाज के विशिष्ट अनुभवों, संस्कृति, भौगोलिक और अन्य परिस्थितियों के संदर्भ में पैदा होते हैं। यही वजह है कि उनका जो ‘नेशन‘ है वो हमारा ‘राष्ट्र‘ नहीं है……. उनका जो ‘कल्चर‘ है वो हमारी ‘संस्कृति‘ नहीं है…….उनका जो ‘रिलीजन‘ है, वो हमारा धर्म नहीं है।
लेकिन दुखद है कि आज राष्ट्रवाद को सिर्फ सत्ता की लड़ाई का हथियार बना दिया गया हैं। निहित स्वार्थों के कारण कुछ राजनीतिक दल इसके मुल तत्व को ही नहीं समझ पा रहे हैं। भारत में राष्ट्रवाद का आधार सांस्कृतिक रहा है लेकिन यूरोप में पूरी तरह राजनीतिक। भारत में राष्ट्रवाद पूरे देश को एक सूत्र में बांधने का उदारवादी साधन रहा है जबकि यूरोप में राष्ट्रवाद राजनीतिक अस्तित्व को बलपूर्वक मान्यता दिलवाने का औजार बना। भारत में राष्ट्रवाद खुद को बलिदान देने की भावना है जबकि यूरोप में बिल्कुल विपरीत है। वहां राष्ट्रवाद विश्वयुद्व का कारण बन गया।
भारत में देशभक्ति और राष्ट्रवाद का विकास ऐसी किसी पश्चिमी आधुनिक राजनीतिक विचारधारा केी वजह से नहीं हुआ। अगर बंगाल से उठा वंदे मातरम का जयघोष सारे देश के लोगों की आवाज बन गया तो इसकी वजह यही थी कि हमारे लिए देश से प्यार राजनीतिक नहीं सांस्कृतिक और आध्यात्मिक चेतना का अंग है। भारत महज एक भूखंड नहीं, भारत माता है, लोगों के लिए वंदनीय अपने संसाधनों से लोगों का भला करने वाली, अपने साधकों को सफलता और समृद्धि का आशीर्वाद देने वाली……..सारे देश के लोगों को एक सूत्र में बांधने वाली।
मै देश के विभिन्न हिस्सों और विभिन्न वर्गों के साथ अपने अनुभवों के आधार पर दावे से कह सकती हूं कि लोगों में राष्ट्रवाद और देशप्रेम की भावना में कोई कमी नहीं है और वो वक्त आने पर इसका प्रदर्शन भी करते हैं लेकिन अब शासन और प्रशासन को और अधिक सक्रिय और जवाबदेह होना पड़ेगा। भारत मां कल्याणमयी है, मगर इसके संसाधनों के ृिवतरण और लोगों की समृद्धि और विकास का कार्य आज हमारे चुने हुए प्रतिनिधियों के हाथ में है। भारत मां आपकी वाणी को सुन रही है, आपके कर्मों को देख रही है। आप उनके कोटि कोटि बालकों का उत्थान और विकास करते हो या शोषण और विनाश, वो आपको इसी आधार पर फल देगी।
इसलिए आज हमें भारत मां के कोेटि कोटि बालकों कोे साथ लेकर, उनकी भावनाओं का सम्मान करते हुए उनके आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक विकास के लिए प्रयास करना होगा।
मैं ये भी कहना चाहूंगी कि लोगों के देशप्रेम और देशभक्ति को सहज ही न लिया जाए। सहस्त्रों वर्षों मे पीढ़ी दर पीढ़ी विकसित हुआ ये संस्कार, सूचना तकनीक और आर्थिक विषमताओं के इस युग में एक आलोड़न से भी गुजर रहा है। अब न केवल केंद्र और राज्य सरकारों को नागरिकों के प्रति अधिक उत्तरदायी और ईमानदार होना पड़ेगा, देश के संपन्न वर्ग को भी साधनहीन लोगों के प्रति और संवेदनशील होना पड़ेगा।
हमने भारतीय नागरिकों को उनके अधिकारों के बारे में तो काफी शिक्षित किया है। अब वक्त आ गया है कि हम उन्हें उनके कर्तव्यों के प्रति भी सचेत करें ताकि अधिकारों के गौरव और कर्तव्य निर्वहन की विनम्रता में तालमेल बिठाते हुए हम बेहतर कल की ओर बढ़ै सकें।
अंत में मैं राजघाट पर स्थापित एक शिलालेख का ज़िक्र करना चाहूंगी जिसका शीर्षक है – गांधी जी का तावीज़। हम सबने उसे पढ़ा है। मैं इसे भारत मां का नेताओं और समृद्ध वर्ग के लिए आदेश मानती हूं। इसमें गांधी जी नेताओं से कहते हैं – तुम जब भी कोई निर्णय लो, समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े दीन हीन व्यक्ति का चेहरा याद रखो। सोचो, तुम्हारे निर्णय से उसका क्या भला होने वाला है। मैं मानती हूं कि गांधी जी के रूप में ये भारत मां ही बोल रही हैं। जब तक अंत्योदय नहीं होगा, निर्धन और शोषित वर्ग का भला नहीं होगा, भारत मां दुखी ही रहेगी। राष्ट्रवाद का उद्देश्य सत्ताप्राप्ति नहीं, लोगों की सेवा और कल्याण है और यही होना भी चाहिए।
भारत भूमि अगर मेरी मां है और मैं इसकी पुत्री तो मैं इसे दुखी कैसे देख सकती हूं?
जय हिंद

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