रेप पीड़ित के लिए कानून

हमारे भारत में यु तोह महिलाओ के अनेक क्षेत्रो में अग्रसर करने के लिए कई तरह के कदम उठाए जाते है। किन्तु कानूनी जानकारी से महिलाए अभी तक अनभिज्ञ है। अब हम रेप पीड़ित को ही ले यदि उससे पहले से ही अपने ऊपर हुए अत्याचार का सामनआ करने के लिए ये ज्ञात हो की किस प्रकार वह अन्याय के खिलाफ कदम उठाए या कानून से उससे किस प्रकार मदद मिल सकती तोह उससे एक मानसिक संबल प्राप्त होता है। …….
….. इन सब पहलुओ की जानकारी यदि किसी भी महिला को तो रपए पीड़िता अपने आत्मा सम्मान को पुनर्जीवित करने में समक्ष हो सकेगी।

  • Tolerance vs. Intolerance: The Manufactured Debate

हिन्दू परिवार व्यवस्था

विश्व में अनेक स्थानों पर विविध संस्कृतियों का जनम हुआ, विकास हुआ था विलय भी हुआ। मगर भारत में जिस संस्कृति का जनम हुआ उस हिन्दू संस्कृटिक अखंडित, अशवुनआ, प्रवाह, अनादि काल से आज तक बहता आ रहा है। इस सांस्कृति के निरंतरता का कारन है यहाँ की जीवनदाद्विती, जो त्रिषियो के चिंतन से प्राप्त अनुभवसिड्दर्शन पर आधारित है।
व्यक्तिगत विकास के साथ समाज हिट को भी ध्यान में रखने से व्यक्तित्व जीवन भी समृद्ध होता है और समाज की भी उत्पत्ति होती है। हर व्यक्ति ऐसा व्यहवहार करे इस दृष्टि से अपनी संस्कृति में चार पुरुषार्थ की संकल्पना की गयी है। वह चार पुरुषार्थ है धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष।

  • Intolerance vs. Tolerance: The Manufactured Debate

संपादकीय

हमारा देश “विविधता में एकता” का सबसे बड़ा उदाहरण है। यहाँ अलग-अलग जाती, धर्म, रीति – रिवाज़, संस्कृति, परंपरा और प्रथाओ को मानने वाले तथा भिन्न – -भिन्न भाषाओ को बोलने वाले लोग बिना किसी भेदभाव के रहते है , एक – दूसरे की मान्यताओ का सम्मान करते है और उनकी समझ भी रखते है।
भारत हज़ारो सालो से सहिष्णुता दीखता आ रहा है। वह अपने ऊपर हुए मुगलकालीन अत्याचारो जैसे – मुसलमानो द्वारा हिन्दुओ के साथ मारकाट मचाना, जजिया थोपना, हिन्दू धार्मिक स्थलों को नष्ट करना, हिन्दू स्त्रिकयों के साथ बलात्कार आदि सभी को कब का भुला चूका है और “जियो और जीने दो ” के सिद्धांत को अपनाकर निरंतर प्रगति के पथ पर अग्रसर है।

  • Tolerant India vs. Intolerant India: The Manufactured Debate

India is not an Intolerant Country

India, the world’s largest democracy, has inherently provided the right to free speech and opinion for all sections of the society within its constitution.

The opposition, the media and established writers are only focused on criticizing the present government and thus to the world. We, on the ground level know that this is not the case. We Indians live in harmony. It is very painful to see British and foreign media teaching us about human rights, when their own history does not support the humanely approach. India is on the rise and a whole lot of countries want to invest in India. To facilitate this, the media has to play a vital role. Our honorable Prime Minister was elected to office by the common consensus of the largest democracy in the world. Thus, our trust and respect in his judgment and efforts is mandatory to ensure the unhindered progress of our country.

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राष्ट्रवाद और स्वामी विवेकानन्द

कि किसी भी राष्ट्र का स्वरूप-भूमि, उस भूमि पर बसने वाले लोग और उनकी संस्कृति के संयोग से बनता है।

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आर्थिक राष्ट्रवाद-भारतीय दृष्टिकोण

पर हे हरि, डाला मैं जाऊँ।
चाह नहीं, देवों के सिर पर चढूँ भाग्य पर इठलाऊँ।
मुझे तोड़ लेना वनमाली उस पथ पर देना तुम फेंक
मातृृृृृ भूमि पर श् ाीष चढ़ाने जिस पथ जाएं वीर अनेक

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राष्ट्रवाद

ऐसे ही एक महान समाजिक व धार्मिक सुधरक जिन्होंने न केवल हिंदु समाज में उस समय प्रचलित कुरीतिओं के विरूद्ध आवाज उठाई अपितु वैदिक शिक्षा व ज्ञान का प्रचार कर राष्ट्रीयता की भावना का भी संचार किया। जी हाँ, महर्षि स्वामीदयनन्द सरस्वती जिन्होने 1975 में आर्य समाज की स्थापना कर हिंदु समाज को एक नई दिशा प्रदान की।
स्वामीदयनन्द एकमात्र ऐसे समाज सुधारक थे, जिन पर विदेशी शिक्षा का कोई प्रभाव नहीं था। देश भ्रमण के दौरान उन्होंने भारतीय संस्कृति व सभ्यता के गौरव व महत्व को समझा व उसे जन-जन तक पहुँचाने का कार्य किया।
उनके अनुसार राष्ट्र की परिभाषा, ‘एक ऐसे जन समूह के रूप की जा सकती है जोकि एक निश्चित भौगोलिक सीमाओं में एक निश्चित देश में रहता हो, जिसकी अपनी ऐतिहासिक पहचान हो, एक खास संस्कृति हो, एक समान भाषा हो व खुद का राज अर्थात स्वराज हो।’

जननी और जन्मभूमि का महत्व

जननी जन्मभूमिस्च स्वर्गादपि गरियसि-यानी जननी और जन्मभूमि का स्थान स्वर्ग से भी ऊँचा होता है। माँ अर्थात ममता, माँ से ही घर और परिवार, माँ ही जीवन देने वाली और जीवन को संभालने वाली, क्या जिस कोक से जन्मे उसके प्रति कोई ऋण नहीं! क्या ऋण सिर्फ उस माँ का जिसने पैदा किया?

हमारा राष्ट्र हमारे शरीर के समान है। यदी एक अंग कमजोर हो जाए तो उस अंग को काट नहीं देते अपितु उसका इलाज करते हैं। यही अन्तर है भारतीय सोच और साम्यवादी की सोच में।

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नैशनलिजम

अथर्ववेद के एक मंत्र में भारतीय राष्ट्रवाद के प्रति जो भाव है वह इस प्रकार है – माता भूमि पुत्रोंअहम पृथिव्याह।
देश के प्रति कृतज्ञता , समपर्ण और कुछ कर गुजरने का जज्बा। मेरे लिए राष्ट्रवाद का यह पहला और मौलिक पाठ है। मेरे लिए राष्ट्रवाद का यह पहला और मौलिक पथ है। मेरे लिए राष्ट्रवाद एक संस्कार नहीं है। मैं यहाँ आपको अर्थव वेद का वो मंत्र फिर से याद दिला दू जिसका उल्लेख मैंने आरम्भ में किया था – माता भूमि पुत्रोहम पृथव्याहा।

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Twenty-One Outlooks of Nationalism in One Study Circle Meet of GIA

Group of Intellectuals and Academicians  (GIA)  is setting bigger standards for itself with  each passing day. The Monthly Study  Circle of GIA  has been  taking place every month     since its inception 11 months ago in which discussions over  a  pre-decided issue of current relevance have been  taking place. This  time  GIA  celebrated the  last  Monthly Study  Circle of its first year  of establishment at Kirori  Mal College, the University of Delhi on the  16th   April  2016 at  3.00pm.

The program was coordinated by  Dr. Poonam Kumaria and  vote  of  thanks was given  by  Dr.  Namita Gandhi. The  overall Convenor and co-convenor of the well- organised programme  were   Ms.  Monika Arora and Ms. Lalita Nijhawan, the two pillars and  torchbearers of GIA.

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