राष्ट्रवाद और स्वामी विवेकानन्द

कि किसी भी राष्ट्र का स्वरूप-भूमि, उस भूमि पर बसने वाले लोग और उनकी संस्कृति के संयोग से बनता है।

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आर्थिक राष्ट्रवाद-भारतीय दृष्टिकोण

पर हे हरि, डाला मैं जाऊँ।
चाह नहीं, देवों के सिर पर चढूँ भाग्य पर इठलाऊँ।
मुझे तोड़ लेना वनमाली उस पथ पर देना तुम फेंक
मातृृृृृ भूमि पर श् ाीष चढ़ाने जिस पथ जाएं वीर अनेक

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राष्ट्रवाद

ऐसे ही एक महान समाजिक व धार्मिक सुधरक जिन्होंने न केवल हिंदु समाज में उस समय प्रचलित कुरीतिओं के विरूद्ध आवाज उठाई अपितु वैदिक शिक्षा व ज्ञान का प्रचार कर राष्ट्रीयता की भावना का भी संचार किया। जी हाँ, महर्षि स्वामीदयनन्द सरस्वती जिन्होने 1975 में आर्य समाज की स्थापना कर हिंदु समाज को एक नई दिशा प्रदान की।
स्वामीदयनन्द एकमात्र ऐसे समाज सुधारक थे, जिन पर विदेशी शिक्षा का कोई प्रभाव नहीं था। देश भ्रमण के दौरान उन्होंने भारतीय संस्कृति व सभ्यता के गौरव व महत्व को समझा व उसे जन-जन तक पहुँचाने का कार्य किया।
उनके अनुसार राष्ट्र की परिभाषा, ‘एक ऐसे जन समूह के रूप की जा सकती है जोकि एक निश्चित भौगोलिक सीमाओं में एक निश्चित देश में रहता हो, जिसकी अपनी ऐतिहासिक पहचान हो, एक खास संस्कृति हो, एक समान भाषा हो व खुद का राज अर्थात स्वराज हो।’

जननी और जन्मभूमि का महत्व

जननी जन्मभूमिस्च स्वर्गादपि गरियसि-यानी जननी और जन्मभूमि का स्थान स्वर्ग से भी ऊँचा होता है। माँ अर्थात ममता, माँ से ही घर और परिवार, माँ ही जीवन देने वाली और जीवन को संभालने वाली, क्या जिस कोक से जन्मे उसके प्रति कोई ऋण नहीं! क्या ऋण सिर्फ उस माँ का जिसने पैदा किया?

हमारा राष्ट्र हमारे शरीर के समान है। यदी एक अंग कमजोर हो जाए तो उस अंग को काट नहीं देते अपितु उसका इलाज करते हैं। यही अन्तर है भारतीय सोच और साम्यवादी की सोच में।

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नैशनलिजम

अथर्ववेद के एक मंत्र में भारतीय राष्ट्रवाद के प्रति जो भाव है वह इस प्रकार है – माता भूमि पुत्रोंअहम पृथिव्याह।
देश के प्रति कृतज्ञता , समपर्ण और कुछ कर गुजरने का जज्बा। मेरे लिए राष्ट्रवाद का यह पहला और मौलिक पाठ है। मेरे लिए राष्ट्रवाद का यह पहला और मौलिक पथ है। मेरे लिए राष्ट्रवाद एक संस्कार नहीं है। मैं यहाँ आपको अर्थव वेद का वो मंत्र फिर से याद दिला दू जिसका उल्लेख मैंने आरम्भ में किया था – माता भूमि पुत्रोहम पृथव्याहा।

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