‘गरीबों के मसीहा हैं नरेंद्र मोदी’ in Punjab Kesari

अब तक जो चुनावी गठबंधन हुए हैं, जो आम आदमी की राय बन रही है, उससे एक बात स्पष्ट है कि देश में प्रधानमंत्री पद के लिए नरेंद्र मोदी का कोई विकल्प नहीं है और वही मई में पुनः प्रधानमंत्री बनेंगे। अफवाहबाज कांग्रेस ने राफेल से लेकर रोजगार तक लगभग हर मुद्दे पर लोगों को गुमराह करने की कोशिश की और देश को सांप्रदायिक आधार पर बांटने के षडयंत्र रचे, लेकिन यदि आमजन से बात करें तो पता लगता है कि कांग्रेस की अफवाहबाजी चाय के प्याले में तूफान से अधिक कुछ नहीं है जिसे कांग्रेसी मीडिया बढ़ावा देता है और कांग्रेसी कार्यकर्ता पब्लिक के गले उतारने की असफल कोशिश करता है।

कांग्रेस जब मोदी पर हमला करती है तो ये भूल जाती है कि उसने अपने प्रत्यक्ष-अप्रयक्ष साठ साल के शासनकाल में क्या नहीं किया। हकीकत तो ये है कि उसने सिर्फ मोटे-मोटे जुमले उछाले और जमीनी स्तर पर आम आदमी का जीवनस्तर सुधारने का कोई ठोस काम नहीं किया। एक बानगी देखिए – कांग्रेसी प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने देश में आर्थिक उदारीकरण की नई बयार शुरू की जिसे उनके शागिर्द रहे मनमोहन सिंह ने आगे बढ़ाया। लेकिन अगर हम इस पूरी प्रक्रिया को ध्यान से देखें तो पता लगेगा कि उनके अधूरे सुुधार और अंधा क्रोनी कैपिटल्जिम आम आदमी के लिए कितना घातक सिद्ध हुआ। एक तरफ तो मनमोहन सिंह के कार्यकाल में खरबों रूपए के घोटाले हुए तो दूसरी ओर आम आदमी के लिए हायर एंड फायर की नीति लागू हो गई। इसमें कर्मचारी को 11 महीने के कांट्रेक्ट और एक महीने के नोटिस पर रखा जाता है। बाॅस से जरा सी अनबन हुई नहीं कि कर्मचारी नौकरी से बाहर।

जाहिर है न तो नरसिम्हा राव ने, और न ही उनके चेले मनमोहन सिंह ने आमजन की सामाजिक सुरक्षा के लिए कोई काम किया। राहुल गांधी भले ही मोदी पर उद्योगपतियों से सांठगांठ करने की कितने ही झूठे आरोप लगाते रहे हों, लेकिन हकीकत यही है कि कांग्रेस ने विजय माल्या, नीरव मोदी जैसे दसियों करीबी धूर्त व्यापारियों को पब्लिक सैक्टर बैंकों से खरबों रूपए के ऋण दिलवाए और उन्हें गबन करने की छूट दी। कभी आपने सोचा कि यदि 2014 में मोदी सरकार नहीं आई होती तो क्या सूरत होती? हम आपको बताते हैं – कांग्रेस के पुनः सरकार बनाने की स्थिति में इन मक्कार व्यापारियों को और कर्ज दिया जाता और फिर नेता, नौकरशाह, बैंकर इनके साथ मिलकर जनता के खरबों रूपए चुपचाप अपनी जेब के हवाले कर देते।

इसके विपरीत मोदी सरकार ने धूर्त व्यापारियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई ही नहीं की, ऐसे कानून भी बनाए जिससे ऐसे हालात दोबारा पैदा ही न हों। अगर हों भी तो इन मक्कार लोगों की सारी चल-अचल संपत्ति जब्त की जा सके। धूर्त व्यापारियों के साथ मिलकर जनता का पैसा लूटने की जगह मोदी सरकार ने सही मायने में ईमानदार आर्थिक सुधार किए और आमजन की सामाजिक सुरक्षा और न्याय को सबसे अधिक तवज्जो दी। प्रधानमंत्री जनधन योजना के तहत गरीब लोगों के 28 करोड़ खाते खोले गए और उन्हें औपचारिक क्षेत्र की विŸाीय सेवाओं के दायरे में लाया गया। इसमें बड़ी संख्या में महिलाओं के खाते भी खोले गए। यही नहीं, मोदी सरकार ने आमजन को सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने के लिए प्रधानमंत्री जीवन ज्योति बीमा योजना, प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना, अटल पेंशन योजना जैसी अनेक योजनाएं शुरू कीं। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि एक करोड़ से भी अधिक लोग सुनिश्चित आय देने वाली अटल पेंशन योजना का लाभ ले रहे हैं। मोदी सरकार की सामाजिक सुरक्षा योजनाओं की सूची काफी लंबी है, लेकिन संक्षेप में कहें तो अब तक 50 करोड़ से भी अधिक लोग इनका लाभ उठा चुके हैं। यहां आयुष्मान योजना का उल्लेख आवश्यक है जिसके तहत गरीब परिवारों को प्रतिवर्ष पांच लाख रूपए का मेडिकल बीमा मिलता है। इस अकेली योजना का लाभ करीब 5 करोड़ परिवारों को मिला है।

विपक्षी मोदी सरकार को घेरने के लिए कुछ चुनींदा विषयों को बार बार उठाते हैं जैसे ‘किसानों की बदहाली’, ‘बेरोजगारी’ आदि। आपको बता दें कि इन दोनों क्षेत्रों को बेहतर बनाने के लिए जितना काम मोदी सरकार ने किया है, उतना पिछले 70 साल में किसी सरकार ने नहीं किया। भारत के इतिहास में पहली बार मोदी सरकार ने रूरल इम्पलाॅयमेंट गारंटी प्रोग्राम (मनरेगा) का सालाना बजट 60,000 करोड़ तक बढ़ाया है। इस कार्यक्रम के तहत ग्रामीण मजदूरों को प्रतिवर्ष कम से कम 100 दिन का रोजगार दिया जाता है। इसी प्रकार ग्रामीण सड़कों के विकास का बजट प्रतिवर्ष 19,000 करोड़ तक किया गया। पिछले 70 साल से देश के गांव अंधेरे में डूबे थे, लेकिन मोदी सरकार ने सौभाग्य योजना और दीनदयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना के तहत लगभग हर इच्छुक परिवार तक बिजली पहुंचा दी। पिछली जनगणना में देश में 5,97,464 ग्राम चिन्हित किए गए थे। बड़ी उपलब्धि ये है कि इन सभी गांवों तक बिजली पहुंचा दी गई है। ग्रामीण महिलाओं की रोजमर्रा की तकलीफें दूर करने के लिए बड़े पैमाने पर शौचालय बनाए गए हैं। उनके स्वास्थ्य का ध्यान रखते हुए उन्हें उज्जवला योजना के तहत गैस कनेक्शन दिए गए हैं। स्थानाभाव के कारण हम यहां कुछ ही योजनाओं का उल्लेख कर पा रहे हैं। कहना न होगा कि गांव वालों को ग्राम केंद्रित योजनाओं का लाभ तो मिलता ही है, साथ ही वो सामान्य योजनाओं से भी लाभान्वित होते हैं।

मोदी सरकार के खिलाफ जो सबसे बड़ा झूठ फैलाया जा रहा है वो ये कि सरकार रोजगार के मुद्दे पर पूरी तरह विफल रही है। इससे बड़ा झूठ कोई हो नहीं सकता। इम्पलाई प्राॅवीडेंट फंड आॅर्गनाइजेशन (ईपीएफओ) के ताजा आंकड़ांे के अनुसार सितंबर 2017 से जनवरी 2019 के बीच ईपीएफओ की सामाजिक सुरक्षा योजनाओं में 76.48 लाख लोग जुड़े। इसका सीधा अर्थ है कि संगठित क्षेत्र में इस 17 महीने की अवधि के दौरान इतनी ही नौकरियों का सृजन हुआ। अकेले जनवरी, 2019 में ही 8,96,516 लोग ईपीएफओ से जुड़े जो सितंबर से अब तक सर्वाधिक है।

रोजगार के संबंध में उद्योग संगठन काॅनफेडरेशन आॅफ इंडियन इंडस्ट्रीज (सीआईआई) के आंकड़े बताते हैं कि मोदी सरकार के कार्यकाल में रोजगार क्षेत्र में उल्लेखनीय सुधार हुआ। आंकड़ों के मुताबिक माइक्रो, मीडियम एंड स्माॅल एंटरप्राइजेज (एमएसएमई) क्षेत्र में रोजगार में प्रतिवर्ष 13.9 प्रतिशत प्रतिवर्ष की वृद्धि हुई। ये आंकड़ा एक सर्वेक्षण के बाद मिला जिसमें 1,05,347 एमएसएमई ईकाइयों ने भाग लिया। ये आंकड़ा विपक्ष के उस दावे की हवा निकाल देता है जो कहता है कि नोटबंदी और जीएसटी के कारण इस क्षेत्र को व्यापक हानि हुई और रोजगार वृद्धि दर नकारात्मक हो गई। सरकार ने करीब 16 करोड़ लोगों को मुद्रा योजना के तहत स्वरोजगार के लिए ऋण दिए। अगर हम मान लें कि इसमें सिर्फ 50 फीसदी उद्यमी ही सफल हुए तब भी अगर प्रत्येक उद्यमी ने एक व्यक्ति को भी रोजगार दिया हो तो अकेले इसी तरह 16 करोड़ रोजगार का सृजन हुआ। इसके अतिरिक्त स्टार्ट अप इंडिया और अनुसूचित जाति, जनजाति एवं महिला उद्यमियों के लिए आरंभ की गई स्टैंड अप इंडिया योजनाओं के तहत भी लाखों रोजगार का सृजन हुआ है।

भारत का सकल घरेलू उत्पाद (ग्राॅस डोमेस्टिक प्राॅडक्ट, जीडीपी) 2013 में 1.857 ट्रिलियन डाॅलर था जो 2018 में 2.7 ट्रिलियन डाॅलर हो गया। आप अनुमार लगा सकते हैं कि ये वृद्धि आर्थिक गतिविधियों और रोजगार वृद्धि के बिना तो संभव नहीं ही हुई होगी। यूपीए सरकार ने मनरेगा के लिए 2013 में 24,000 करोड़ रूपए दिए थे जो 2019 में बढ़ कर 60,000 करोड़ रूपए हो गए। जाहिर है इसके तहत भी करोड़ों कृषि मजदूरों को रोजगार मिला ही होगा। विŸाीय वर्ष 2017-18 में व्यावसायिक वाहनों की बिक्री 20.6 प्रतिशत बढ़कर 8,56,000 युनिट तक पहुंच गई। यही ट्रंेड अगले विŸा वर्ष में भी जारी रहने का अनुमान है। आप सहज ही अनुमान लगा सकते हैं कि इन वाहनों के परिचालन में भी लाखों लोगों को रोजगार मिला ही होगा। अगर हम क्षेत्रवार आंकड़े बताने लगें तो काफी स्थान चाहिए होगा। संक्षेप मंे कहें तो ‘रोजगार की कमी’ का विपक्षी दुष्प्रचार अफवाह से अधिक कुछ नहीं है।

मोदी के सत्ता में आने के बाद ‘असहिष्णुता गैंग’ ने उसके बारे में मनगढ़ंत झूठ प्रचारित करने शुरू कर दिए। इनमें से सबसे बड़ा झूठ ये था कि सरकार ‘लोगों की आवाज दबा रही है’ और ‘अभिव्यक्ति की आजादी खतरे में है’। आपने स्वयं देखा होगा कि पिछले पांच साल में विपक्षियों ने राफेल से रोजगार तक आए दिन कितनी ही अफवाहें उड़ाईं। कितने विपक्षी नेताओं ने तो मोदी के खिलाफ अपमानजनक भाषा तक का प्रयोग किया। सरकार को अफवाहों पर लगाम लगाने का पूरा अधिकार है, फिर भी सरकार ने विपक्ष को झूठ प्रचारित करने से नहीं रोका अपितु लोकतांत्रिक तरीके से अपना पक्ष सामने रखा। दलितों को भड़काने वाले नक्सली संगठन लगातार ये अफवाह उड़ाते रहे कि मोदी सरकार संविधान बदल देगी। हाल ही में राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने तो ये तक कह मारा कि अगर मोदी फिर से सŸाा में आए तो तानाशाही आ जाएगी और भविष्य में चुनाव नहीं होंगे। इसके विपरीत सत्य यह है कि मोदी ने संसद में अपने पहले ही भाषण में कहा था कि संविधान मेरा धर्म है और मैं हर कीमत पर इसकी हिफाजत करूंगा। हमने पिछले पांच साल में देखा कि मोदी ने हर काम संविधान की मर्यादा में रह कर ही किया।

कुल मिलाकर हम ये दावा कर सकते हैं कि मोदी सरकार वास्तव में जनवादी, उदारवादी और समावेशी सरकार है जिसने अपना हर निर्णय गरीब आवाम और देशहित को ध्यान में रखते हुए लिया और उसकी बेहतरी और विकास के लिए ईमानदारी से कोशिश की। मोदी ने अपने नारे ‘सबका साथ, सबका विकास’ को वास्तव में जमीनी स्तर पर लागू किया। ये सही है कि पिछले 70 साल में कांग्रेसियों ने जो गंद फैलाया, वो महज पांच साल में साफ नहीं हो सकता। लेकिन ये भी हकीकत है कि मोदी ने विपक्ष की इस्लामिक सांप्रदायिक, देशविरोधी ओछी राजनीति के बावजूद पूरी तरह साफ-सुथरी विकासपरक सरकार चलाई और समाज के दलित-शोषित वर्ग को सर्वोच्च वरीयता दी।

जब मोदी मुकाबिल हो तो अफवाह फैलाओ

जब मोदी मुकाबिल हो तो अफवाह फैलाओ in ‘Punjab Kesari’

अकबर इलाहाबादी का शेर है – खींचो न कमानों को न तलवार निकालो, जब तोप मुकाबिल हो तो अखबार निकालो। जिस तरह कांग्रेसी मीडिया और कुछ अन्य विपक्षी दल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार के खिलाफ अफवाहें फैला रहे हैं, उससे हमें इस शेर की पैरोडी सूझ रही हैः

खींचो न कमानों को न तलवार निकालो,  जब मोदी मुकाबिल हो तो अफवाह फैलाओ

अफवाहों का ये सिलसिला नया नहीं है। ये अवश्य है कि आगामी लोकसभा चुनावों को देखते हुए अब इसने गति पकड़ ली है। मोदी के प्रधानमंत्री पद की शपथ लेते ही कट्टरपंथी इस्लामिक-नक्सली गैंग ने ‘असहिष्णुता’ राग छेड़ दिया था। इसके अनेक सदस्य जो भ्रष्ट कांग्रेस राज में मलाई खा रहे थे और जिनकी पांचों उंगलियां घी में और सिर कढ़ाई में थे, मोदी राज में अनाथ हो गए। उनके राजनीतिक आका ही सड़क पर नहीं आए, उनकी खुद की दुकानें और विदेशी दौरे भी बंद हो गए। इनमें से अनेक तो ऐसे नक्सली भी थे जिनकी सोनिया गांधी की नेशनल एडवाइजरी काउंसिल में सीधी पहुंच थी। कांग्रेस राज में नेशनल हेरल्ड, टूजी, सीडब्लूजी, अगुस्ता वेस्टलेंड से लेकर न जाने कितने घोटाले सामने आए, कितनी ही जमीनें गांधी परिवार ने देश के अलग-अलग हिस्सों में अपनी संस्थाओं के नाम पर हड़पीं, राष्ट्रीय दामाद राॅबर्ट वाड्रा तक के दसियों घोटाले सामने आए जिनकी कीमत खरबों रूपए में थी। लेकिन कांग्रेस राज में घी पीने वाले इन अंधभक्तों ने कभी किसी घोटाले के खिलाफ आवाज नहीं उठाई, जनता का पैसा लुटता रहा, मगर इनका दिल नहीं पसीजा।

मोदी के आते ही इनका ‘जमीर’ जागृत हो गया, इन्हें हर तरफ असहिष्णुता नजर आने लगी। कांग्रेस राज में हिंसा कहीं ज्यादा होती थी। तब तो बाकायदा हिंदुओं को आतंकवादी साबित करने का षडयंत्र तक किया गया, लेकिन तब इन्हें कोई ‘असहिष्णुता’ नजर नहीं आई। मोदी के आते ही मुस्लिमों के खिलाफ हुई गिनी-चुनी घटनाओं को राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऐसे पेश किया जाने लगा जैसे भारत में तबाही आ गई हो और इसके 20 करोड़ मुसलमान त्राही-त्राही कर रहे हों। ये मोदी सरकार के खिलाफ अफवाह फैलाने की पहली बड़ी साजिश थी। इसमें पाकिस्तान से लेकर अमेरिका तक फैले इनके भारत विरोधी नेटवर्क ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया और मोदी सरकार की छवि कलूषित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। इन अफवाहों का मकसद एक तीर से दो शिकार करना था – मोदी सरकार की छवि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दागदार करना और मुसलमानों में हिंदुओं के प्रति नफरत और डर पैदा कर उनका ध्रुवीकरण सुनिश्चित करना।

हमने देखा जब कश्मीरी आतंकवादी और संसद पर हमले के आरोपी अफजल गुरू की याद में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में टुकड़े-टुकड़े गैंग ने भारत की बर्बादी और उसे तोड़ने के नारे लगाए, तो असहिष्णुता की बात करने वाला ये पूरा कट्टरपंथी इस्लामिक-नक्सली गैंग नारे लगाने वालों के समर्थन में लामबंद हो गया और देशद्रोहियों पर कार्रवाई को अभिव्यक्ति की आजादी का उल्लंघन बताने लगा। राहुल गांधी, अरविंद केजरीवाल, सीताराम येचुरी…वहां लगभग पूरा गैंग मौजूद था। आश्चर्य की बात तो ये है कि वहां जिसके दिल में जो आया, उसने कहा फिर भी सरकार पर आरोप लगाया कि सरकार अभिव्यक्ति की आजादी पर रोक लगाा रही है। राहुल गांधी ने तो मोदी के खिलाफ जो अनर्गल प्रलाप किया वो सब जानते हैं, अगर बोलने पर रोक होती तो क्या राहुल और उनका गैंग ऐसे अपशब्दों का प्रयोग कर पाते? सोनिया ने मोदी को मौत का सौदागर बोला तो राहुल मोदी को नफरत फैलाने वाला बता दिया। अगर देश में बोलने की आजादी पर रोक होती तो क्या राहुल की बेलगाम जबान ऐसे चल रही होती? हकीकत तो ये है कि राहुल और कांग्रेस का मीडिया सेल अफवाहों की दुकान बन गए हैं, जो जिसके मन में आ रहा है, बोल रहा है।

कांग्रेसी वकील अभिषेक मनु सिंघवी सुप्रीम कोर्ट में अर्बन नक्सलियों का मुकदमा लड़ते हैं और कपिल सिब्बल पूर्व में सिमी और अब पाॅपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया का। मीडिया में कांग्रेसी प्रवक्ता इन देशद्रोहियों की ढाल बनते हैं और फिर आश्चर्य राहुल गांधी मोदी, भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर नफरत फैलाने का आरोप लगाते हैं। ये निरी अफवाह नहीं तो और क्या है? आश्चर्य नहीं कि ये पूरा मसला मुसलमानों के एक वर्ग की हिंदू विरोधी भावना भड़का कर वोट बटोरने का है। इन लोगों ने देश पर इतने साल शासन किया लेकिन कभी मुसलमानों को ये नहीं कहा कि उन्हें अपने धर्म से पहले देश के संविधान को मानना होगा। मोदी कहते हैं मेरा धर्म संविधान है और संसद मेरा मंदिर। प्रधानमंत्री के तौर पर उन्होंने इसे पूरी तरह निभाया। दुखद है कि नक्सलियों और इस्लामिक आतंकियों का समर्थन करने वाले आज ये कह रहे हैं कि उन्हें संविधान की रक्षा के लिए मोदी से छुटकारा चाहिए। ऐसे लोगों से एक छोटा परंतु बड़ा सवाल – जब नक्सली देश के 20 प्रतिशत भूभाग पर कब्जा कर रहे थे, तब ये कहां सो रहे थे?

मोदी सरकार के खिलाफ दूसरी बड़ी अफवाह फैलाई बहुजन समाज पार्टी अध्यक्ष मायावती ने। लोकसभा के बाद जब विधानसभा चुनाव भी वो बुरी तरह हारीं तो उन्होंने सारा ठीकरा इलैक्ट्रोनिक वोटिंग मशीनों (ईवीएम) के सिर फोड़ दिया। इसके बाद समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव, आम आदमी पार्टी अध्यक्ष अरविंद केजरीवाल से लेकर राहुल गांधी तक सब इस कोरस में शामिल हो गए। केजरीवाल ने इस विषय में दिल्ली विधानसभा का विशेष सत्र तक बुला लिया। सुप्रीम कोर्ट में ईवीएम के खिलाफ याचिका तक दायर की गई लेकिन वहां भी कुछ हासिल नहीं हुआ। ईवीएम धारावाहिक का ताजा ऐपीसोड हमने हाल ही में लंदन में देखा जहां कांग्रेसी नेता कपिल सिब्बल की सरपरस्ती में एक कथित नकाबधारी हैकर सयद शुजा ने ईवीएम को लेकर बिना किसी सबूत के बेसिरपैर के आरोप लगाए। जब वहां मौजूद लोगों ने उससे सबूत मांगा तो वो बिना जवाब दिए वहां से खिसक लिया। जाहिर है विधि मंत्री रविशंकर प्रसाद ने ही नहीं, चुनाव आयोग ने भी इसका कड़ा विरोध किया। कांग्रेसी नेताओं को विदेशी धरती पर ऐसी हरकतें करते शर्म भी नहीं आई। उन्होंने निष्पक्ष चुनाव आयोग का ही नहीं, अपने लोकतंत्र और उसकी सम्मानित संस्थाओं का अपमान भी किया। वैसे भी देखने में यही आ रहा है कि कांग्रेस अब मोदी विरोध में इतनी अंधी हो गई है कि उसके लिए लोकतंत्र की सभी संस्थाएं और उनका गौरव नगण्य हो गया है। उसे ये समझ में नहीं आ रहा कि वो अपनी आत्मघाती हरकतों से अपना ही नहीं, देश का भी कबाड़ा कर रही है। वैसे जब राहुल गांधी खुद विदेशों में देश की लोकतांत्रिक सरकार का अपमान करते रहे हों और सारा प्रोटोकोल ताक पर रख विदेशियों से छुप-छुप कर मिलते रहे हों तो उनकी पार्टी भी अगर विदेश में ऐसे कार्यक्रम करे तो क्या आश्चर्य। आपको याद दिला दें कि अगर लंदन में कपिल सिब्बल मौजूद थे तो दिल्ली में प्रेस क्लब में नक्सली जिग्नेश मेवानी के कार्यक्रम में राहुल के दाएं हाथ अलंकार खुद उपस्थित थे। भीमा कोरेगांव के बाद महाराष्ट्र पुलिस द्वारा दायर चार्जशीट में भी कांग्रेस और जिग्नेश मेवानी का संपर्क सामने आ चुका है।

कांग्रेस, मोदी विरोध में किस कदर अंधी हो गई है, इसका उदाहरण हमें जज लोया मामले में देखने को मिला। इस मामले में कांग्रेसी वकीलों ने तबके मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के खिलाफ अदालत में ही अपशब्दों का प्रयोग किया। ये लोग उनपर दबाव बना रहे थे कि वो जज लोया की प्राकृतिक मृत्यु को हत्या करार दें ताकि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को फंसाया जा सके जिनसे जुड़े एक मामले की वो सुनवाई कर रहे थे। न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा के खिलाफ तो कांग्रेसी महाभियोग प्रस्ताव तक ले आए। कहा तो ये तक जाता है कि कांग्रेसी वकीलों ने दीपक मिश्रा पर दबाव बनाया ताकि वो राम मंदिर मामला टाल दें। न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा के कार्यकाल में जैसे चार न्यायाधीशों (जे चेलमेश्वर, रंजन गोगोई, एम बी लोकुर, कुरियन जोसेफ) ने संवाददाता सम्मेलन किया और जैसे मुख्य न्यायाधीश पर आरोप लगाए, उससे भी न्यायपालिका के राजनीतिकरण का अंदेशा हुआ था। न्यायाधीशों की प्रेसवार्ता के ठीक बाद न्यायमूति चेलमेशवर के घर कम्युनिस्ट पार्टी आॅफ इंडिया के नेता डी राजा का जाना और क्या संकेत देता है?

कांग्रेस अगर अफवाहों का धंधा अदालत तक रखती तब भी गनीमत होती। लेकिन राफेल को लेकर उसने जैसे देश की रक्षा के साथ खिलवाड़ किया वो अक्षम्य है। कांग्रेस ने मनमोहन सरकार के दस वर्ष के शासन में इस सौदे के साथ खिलवाड़ किया जबकि वायुसेना ने इसे देश की रणनीतिक तैयारी की दृष्टि से अनिवार्य बताया था। जब मोदी सरकार ने देश की रक्षा में इसके महत्व को देखते हुए इसे अंजाम तक पहुंचा दिया तो कांग्रेस ने आसमान सर पर उठा लिया और अफवाहों का बाजार गर्म कर दिया। इन अफवाहों के भी दो मकसद थे – मोदी सरकार को बदनाम करना और जैसा कि रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण कहती हैं, प्रतिद्वद्वी कंपनियों का हित साधना। इस मामले में उंगली एक बार फिर राॅबर्ट वाड्रा और उनके दलाल मित्र संजय भंडारी की ओर उठी। कहा तो ये तक गया कि राफेल बनाने वाली कंपनी दासो ने वाड्रा की बात मानने से इनकार किया, इसीलिए मनमोहन सरकार ने ये डील अंतिम चरण में रद्द की। रक्षा मामलों में एक और मामला है जिसमें कांग्रेस ने भ्रम फैलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। ये मामला है सर्जिकल स्ट्राइक का। राहुल गांधी ने इसे खून की दलाली बताया तो केजरीवाल इसके सबूत मांगने लगे। आश्चर्य नहीं कि दोनों के बयानों का भारत से ज्यादा पाकिस्तान में स्वागत हुआ।

कांग्रेसी जुमलेबाजी और अफवाहों के हजारों उदाहरण है, लेकिन चलते चलते सीबीआई की बात करना जरूरी है। आलोक वर्मा को सीबीआई निदेशक बनाने का पहले तो कांग्रेस ने विरोध किया, लेकिन फिर ऐसा क्या हो गया कि कांग्रेस उन्हें बचाने के लिए जी जान से जुट गई। सुप्रीम कोर्ट ने उनके कार्यकाल के बारे में कोई भी निर्णय चयन समिति पर छोड़ दिया जिसमें प्रधानमंत्री, मुख्य न्यायाधीश और नेता प्रतिपक्ष होते हैं। कोर्ट के आदेश के बाद जब इसकी बैठक हुई तो विपक्षी नेता मल्लिकाजुन खड़गे ने उन्हें बचाने में कोई कसर नहीं छोड़ी, लेकिन जब प्रधानमंत्री और मुख्य न्यायाधीश के प्रतिनिधि न्यायमूर्ति ए के सीकरी ने उन्हें हटाने का फैसला किया तो कांग्रेसी मीडिया सीकरी को ही बदनाम करने में लग गया। उनके खिलाफ अफवाहें फैलाई जाने लगीं कि उन्होंने सेवानिवृत्ति के बाद इंग्लैंड में मलाईदार पद के लिए मोदी का साथ दिया। जबकि वास्तविकता ये है कि चयन समिति की बैठक जनवरी में हुई और इंग्लैंड में पोस्टिंग के लिए उनका नाम दिसंबर में ही तय किया जा चुका था।

कांग्रेस ने अपने हित साधन के लिए जैसे देश की लोकतांत्रिक संस्थाओं का दुरूपयोग किया और उन्हें बदनाम किया, वो शर्मनाक ही नहीं, निंदनीय भी है। अब तो ये पार्टी अफवाहों से आगे बढ़ कर धमकाने में भी लग गई है। हाल ही में जब सीबीआई ने हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपिंदर हुड्डा के जमीन घोटालों के सिलसिले में उनके घर पर छापा मारा तो कांग्रेस प्रवक्ता ने बाकायदा उसके अफसरों को धमकाया कि अब चुनाव का कुछ ही समय बाकी है, इसके बाद सभी अफसरों का हिसाब किया जाएगा।

प्रधानमंत्री मोदी, संघ के खिलाफ अफवाहें फैलाना, खुद देश तोड़ने वालों का साथ देना और भाजपा पर देश तोड़ने का आरोप लगाना, मुख्य न्यायाधीश से लेकर चुनाव आयोग और सीबीआई तक सभी संस्थाओं को धमकाना, गांधी परिवार के भ्रष्टाचार में आंकठ डूबे होने के बावजूद बिना सबूत मोदी पर कीचड़ उछालना, ये कांग्रेस की बौखलाहट और झल्लाहट है या सोची समझी रणनीति या बौखलाहट में बनाई गई रणनीति, चाहे कुछ भी हो, एक बात तो स्पष्ट है कि कांग्रेस जनता को लंबे अर्से तक मूर्ख नहीं बना पाएगी। कांग्रेस भले ही कितना दुष्प्रचार करे, उसे ये समझना होगा कि ये पब्लिक है ये सब जानती है, उसे अफवाहों और असलियत का अंतर मालूम है।

राम जन्मभूमिः मीर बकी से मोदी तक और……?

मुजफ्फर इस्लाम रजमी का शेर है – ये जब्र भी देखा है तारीख की नजरों ने, लम्हांे ने खता की थी, सदियों ने सजा पाई। ये शेर राम जन्मभूमि विवाद पर पूरी तरह सटीक बैठता है। वर्ष 1527 में जब बाबर के सेनापति मीर बकी ने अपने सुल्तान के आदेश पर अयोध्या में राम जन्मभूमि मंदिर गिरा कर बाबरी मस्जिद बनाई तो उसने कल्पना भी नहीं की होगी कि हिंदुओं के मानमर्दन का ये कदम वो सदियों तक नहीं भूलेंगे। बाबर ने सोचा होगा कि वो देर-सबेर अपनी ताकत के दम पर भारत के अधिसंख्य हिंदुओं को मुसलमान बना लेगा और ये बात आई-गई हो जाएगी। लेकिन हिंदू अपने अराध्य देव राम का ये अपमान न भूलने वाले थे, और न भूले।

बाबर ने हिंदुओं को जख्म तो दिए पर उन्हें अपनी आस्था से डिगा न सका। इकबाल का एक शेर है – कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी, सदियों रहा है दुश्मन दौरे जमां हमारा। मुस्लिम और ईसाई शासकों ने अपनी दौलत और ताकत के बल पर दुनिया के अनेक देशों का धर्मांतरण कराया, पुरानी से पुरानी सभ्याताएं मिटा डालीं, लेकिन वो भारत में सफल नहीं हो सके। वो बात जिसने हिंदुओं और हिंदुस्तान की हस्ती मिटने नहीं दी, वो ये है कि हमने हालात से समझौता तो किया लेकिन अपने अपमान की आग को अपने सीने में जलाए भी रखा। बाबर के अत्याचार के बावजूद हिंदुओं ने कभी बाबरी मस्जिद के अस्तित्व को स्वीकार नहीं किया। जनश्रुतियों में, हमारी लोक कथाओं में हमने राम जन्मभूमि को जीवित रखा। देश की इस्लाम परस्त ताकतें भले ही ये भूल गईं या भूलने का नाटक करती रहीं कि जुल्म की प्रतीक बाबरी मस्जिद के नीचे मंदिर था, लेकिन हिंदू ये नहीं भूले।

आधुनिक समय में 1853 में पहली बार निर्मोही संप्रदाय ने इस ढांचे पर दावा पेश करते हुए कहा कि जहां ये ढांचा खड़ा है, पहले वहां मंदिर था। उस समय वहां नवाब वाजिद अली शाह की हुकूमत थी। फैजाबाद जिला गजट 1905 के अनुसार 1855 तक हिंदू और मुसलमान दोनों एक ही इमारत में पूजा या इबादत करते रहे। लेकिन 1857 की क्रांति के बाद मस्जिद के सामने एक बाहरी दीवार डाल दी गई और हिंदुओं को अंदरूनी प्रांगण में जाने और उस चबूतरे पर चढ़ावा चढ़ाने से रोक दिया गया जिसे उन्होंने बाहरी दीवार पर खड़ा किया था। जाहिर है अंग्रेजों ने इस मसले को दोनों समुदायों में वैमनस्य बढ़ाने के लिए इस्तेमाल किया।

उसके बाद वर्ष 1992 में विवादित ढांचा गिरने तक अनेक नाटकीय घटनाएं और संघर्ष हुए जिनमें हजारों लोग मारे गए। स्वर्गीय प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने हिंदुओं से ये वादा किया कि अगर इस ढांचे के नीचे मंदिर के अवशेष निकले तो वो ये स्थान उन्हें सौंप देंगे। ढांचे के गिरने और उसके पहले दो बार विस्तृत वैज्ञानिक जांच हुई और दोनों बार ये पाया गया कि इसके नीचे मंदिर था। लेकिन नरसिम्हा राव ने अपना वादा नहीं निभाया। आजादी के बाद वोट बैंक की राजनीति ने समीकरण बदले और इस्लाम परस्त कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टियों ने इसे भारत की ‘धर्मनिरपेक्षता’ और मुसलमानों की ‘प्रतिष्ठा’ का प्रतीक बना दिया। जब ढांचा टूटा तो जबरदस्त दंगे भड़काए गए जिनमें दो हजार से ज्यादा लोग मारे गए। ये ढांचा न तो मुसलमानों का मक्का है और न ही मदीना, न ही इस्लाम में नमाज पढ़ने के लिए मस्जिद को अनिवार्य माना गया है, फिर भी इसे मुसलमानों के गौरव का प्रतीक बना दिया गया। आज बड़ी संख्या में मुसलमान ये स्वीकार करते हैं कि ये जगह हिंदुओं के लिए पाक और मुकद्दस है और यहां राम का मंदिर ही बनना चाहिए, लेकिन कांग्रेसी मौलानाओं का एक बड़ा तबका अब भी इसे हिंदुओं का अपमान करने और उन्हें चिढ़ाने के लिए इस्तेमाल कर रहा है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने हमेशा इसे राष्ट्रीय अस्मिता का प्रतीक माना। यही वजह है कि इसके सहयोगी संगठन विश्व हिंदू परिषद ने राम मंदिर के निर्माण का बीड़ा उठाया। भारतीय जनता पार्टी ने सदा इसे अपने चुनाव घोषणापत्र में स्थान दिया। जिस प्रकार नरेंद्र मोदी स्पष्ट बहुमत के साथ प्रधानमंत्री बने, उससे आजाद भारत के इतिहास में कोटि-कोटि हिंदुओं के मन में पहली बार ये आशा जगी कि वो अवश्य इस मसले को हल कर देंगे। लेकिन इसके लिए कानून लाने की जगह उन्होंने इस विषय में सुप्रीम कोर्ट में चल रहे मुकदमे के फैसले का इंतजार करने का निर्णय लिया। एक बारगी लगा भी कि सुप्रीम कोर्ट इस विषय में जल्द फैसला सुना देगा, लेकिन उसने इसे जनवरी तक टाल दिया।

देशद्रोही नक्सलियों और कश्मीरी आतंकवादियों के लिए रात-रात भर जगने वाले सुप्रीम कोर्ट के इस टरकाऊ रवैये से हिंदू समाज क्षुब्ध है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और विश्व हिंदू परिषद अब इस विषय में व्यापक जनजागरण अभियान चला रहे हैं। इसी संदर्भ में नौ दिसंबर को दिल्ली के रामलीला मैदान में जुटे लाखों रामभक्तों ने एक बार फिर मोदी सरकार को आगाह किया कि वो इस महत्वपूर्ण मसले को नजरअंदाज न करे और इस विषय में जल्द से जल्द कानून बनाए। संघ के सरकार्यवाह भय्या जी जोशी ने सही कहा है कि इस विषय में कानून की मांग कर कोई भीख नहीं मांगी जा रही। राम मंदिर भले ही अब भाजपा नेताओं को चुनावी मुद्दा न लगता हो परंतु विश्व हिंदू परिषद के आंदोलन और फिर लालकृष्ण आडवाणी की रामरथ यात्रा ने लोगों को बड़ी संख्या में जागरूक किया और अपनी अस्मिता का अहसास करवाया जिसका भाजपा को लाभ भी मिला।

संघ और संत समाज के स्पष्ट मत के बाद अपेक्षा की जानी चाहिए कि प्रधानमंत्री मोदी राष्ट्रीय अस्मिता के इस महत्वपूर्ण विषय पर संसद के शीतकालीम सत्र में कानून बनवाएंगे। भारतीय जनता पार्टी के राज्य सभा सांसद राकेश सिन्हा इस विषय में निजी विधेयक की बात भी कर रहे हैं, लेकिन मोदी को अब इसे हलके में नहीं लेना चाहिए। उनकी सरकार के पास सीमित समय बचा है। उन्हें चाहिए कि वो अपने इस ऐतिहासिक सांस्कृतिक दायित्व को अविलंब पूरा करें।

निःसंदेह भारतीय लोकतंत्र में संसद सर्वोच्च है। जब सरकार अनुसूचित जाति-जनजाति अधिनियम पर सुप्रीम कोर्ट का निर्णय बदल सकती है तो राम जन्म भूमि मामले में उसके निर्णय के प्रतीक्षा करने का बहाना क्यों? वैसे भी ये बात ध्यान में रखनी चाहिए कि सुप्रीम कोर्ट में जमीन के स्वामित्व को लेकर मुकदमा चल रहा है, लेकिन हिंदुओं के लिए ये आस्था का प्रश्न है। उन्हें रामलला की उसी जगह पूजा करने और मंदिर बनाने का हक है जिसे वो राम जन्म भूमि मानते हैं।

हालिया विधानसभा चुनावों के दौरान भाजपा नेताओं ने बार-बार ये कहा कि उनके लिए ये चुनावी मुद्दा नहीं, आस्था का विषय है। सवाल ये है कि अगर ये चुनावी मुद्दा नहीं है तो इसे चुनाव घोषणापत्र में क्यों शामिल किया जाता है? जाहिर है, अब मोदी सरकार के पास सीमित समय बचा है। अगर वो इसे अभी नहीं हल करेगी तो कब करेगी? अगर भाजपा पूर्ण बहुमत के बावजूद इस मसले को हल नहीं करेगी तो आगामी चुनावों में वो किस मुंह से लोगों के बीच ये मुद्दा उठाएगी?

रेप पीड़ित के लिए कानून

हमारे भारत में यु तोह महिलाओ के अनेक क्षेत्रो में अग्रसर करने के लिए कई तरह के कदम उठाए जाते है। किन्तु कानूनी जानकारी से महिलाए अभी तक अनभिज्ञ है। अब हम रेप पीड़ित को ही ले यदि उससे पहले से ही अपने ऊपर हुए अत्याचार का सामनआ करने के लिए ये ज्ञात हो की किस प्रकार वह अन्याय के खिलाफ कदम उठाए या कानून से उससे किस प्रकार मदद मिल सकती तोह उससे एक मानसिक संबल प्राप्त होता है। …….
….. इन सब पहलुओ की जानकारी यदि किसी भी महिला को तो रपए पीड़िता अपने आत्मा सम्मान को पुनर्जीवित करने में समक्ष हो सकेगी।

  • Tolerance vs. Intolerance: The Manufactured Debate

हिन्दू परिवार व्यवस्था

विश्व में अनेक स्थानों पर विविध संस्कृतियों का जनम हुआ, विकास हुआ था विलय भी हुआ। मगर भारत में जिस संस्कृति का जनम हुआ उस हिन्दू संस्कृटिक अखंडित, अशवुनआ, प्रवाह, अनादि काल से आज तक बहता आ रहा है। इस सांस्कृति के निरंतरता का कारन है यहाँ की जीवनदाद्विती, जो त्रिषियो के चिंतन से प्राप्त अनुभवसिड्दर्शन पर आधारित है।
व्यक्तिगत विकास के साथ समाज हिट को भी ध्यान में रखने से व्यक्तित्व जीवन भी समृद्ध होता है और समाज की भी उत्पत्ति होती है। हर व्यक्ति ऐसा व्यहवहार करे इस दृष्टि से अपनी संस्कृति में चार पुरुषार्थ की संकल्पना की गयी है। वह चार पुरुषार्थ है धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष।

  • Intolerance vs. Tolerance: The Manufactured Debate

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