राम जन्मभूमिः मीर बकी से मोदी तक और……?

मुजफ्फर इस्लाम रजमी का शेर है – ये जब्र भी देखा है तारीख की नजरों ने, लम्हांे ने खता की थी, सदियों ने सजा पाई। ये शेर राम जन्मभूमि विवाद पर पूरी तरह सटीक बैठता है। वर्ष 1527 में जब बाबर के सेनापति मीर बकी ने अपने सुल्तान के आदेश पर अयोध्या में राम जन्मभूमि मंदिर गिरा कर बाबरी मस्जिद बनाई तो उसने कल्पना भी नहीं की होगी कि हिंदुओं के मानमर्दन का ये कदम वो सदियों तक नहीं भूलेंगे। बाबर ने सोचा होगा कि वो देर-सबेर अपनी ताकत के दम पर भारत के अधिसंख्य हिंदुओं को मुसलमान बना लेगा और ये बात आई-गई हो जाएगी। लेकिन हिंदू अपने अराध्य देव राम का ये अपमान न भूलने वाले थे, और न भूले।

बाबर ने हिंदुओं को जख्म तो दिए पर उन्हें अपनी आस्था से डिगा न सका। इकबाल का एक शेर है – कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी, सदियों रहा है दुश्मन दौरे जमां हमारा। मुस्लिम और ईसाई शासकों ने अपनी दौलत और ताकत के बल पर दुनिया के अनेक देशों का धर्मांतरण कराया, पुरानी से पुरानी सभ्याताएं मिटा डालीं, लेकिन वो भारत में सफल नहीं हो सके। वो बात जिसने हिंदुओं और हिंदुस्तान की हस्ती मिटने नहीं दी, वो ये है कि हमने हालात से समझौता तो किया लेकिन अपने अपमान की आग को अपने सीने में जलाए भी रखा। बाबर के अत्याचार के बावजूद हिंदुओं ने कभी बाबरी मस्जिद के अस्तित्व को स्वीकार नहीं किया। जनश्रुतियों में, हमारी लोक कथाओं में हमने राम जन्मभूमि को जीवित रखा। देश की इस्लाम परस्त ताकतें भले ही ये भूल गईं या भूलने का नाटक करती रहीं कि जुल्म की प्रतीक बाबरी मस्जिद के नीचे मंदिर था, लेकिन हिंदू ये नहीं भूले।

आधुनिक समय में 1853 में पहली बार निर्मोही संप्रदाय ने इस ढांचे पर दावा पेश करते हुए कहा कि जहां ये ढांचा खड़ा है, पहले वहां मंदिर था। उस समय वहां नवाब वाजिद अली शाह की हुकूमत थी। फैजाबाद जिला गजट 1905 के अनुसार 1855 तक हिंदू और मुसलमान दोनों एक ही इमारत में पूजा या इबादत करते रहे। लेकिन 1857 की क्रांति के बाद मस्जिद के सामने एक बाहरी दीवार डाल दी गई और हिंदुओं को अंदरूनी प्रांगण में जाने और उस चबूतरे पर चढ़ावा चढ़ाने से रोक दिया गया जिसे उन्होंने बाहरी दीवार पर खड़ा किया था। जाहिर है अंग्रेजों ने इस मसले को दोनों समुदायों में वैमनस्य बढ़ाने के लिए इस्तेमाल किया।

उसके बाद वर्ष 1992 में विवादित ढांचा गिरने तक अनेक नाटकीय घटनाएं और संघर्ष हुए जिनमें हजारों लोग मारे गए। स्वर्गीय प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने हिंदुओं से ये वादा किया कि अगर इस ढांचे के नीचे मंदिर के अवशेष निकले तो वो ये स्थान उन्हें सौंप देंगे। ढांचे के गिरने और उसके पहले दो बार विस्तृत वैज्ञानिक जांच हुई और दोनों बार ये पाया गया कि इसके नीचे मंदिर था। लेकिन नरसिम्हा राव ने अपना वादा नहीं निभाया। आजादी के बाद वोट बैंक की राजनीति ने समीकरण बदले और इस्लाम परस्त कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टियों ने इसे भारत की ‘धर्मनिरपेक्षता’ और मुसलमानों की ‘प्रतिष्ठा’ का प्रतीक बना दिया। जब ढांचा टूटा तो जबरदस्त दंगे भड़काए गए जिनमें दो हजार से ज्यादा लोग मारे गए। ये ढांचा न तो मुसलमानों का मक्का है और न ही मदीना, न ही इस्लाम में नमाज पढ़ने के लिए मस्जिद को अनिवार्य माना गया है, फिर भी इसे मुसलमानों के गौरव का प्रतीक बना दिया गया। आज बड़ी संख्या में मुसलमान ये स्वीकार करते हैं कि ये जगह हिंदुओं के लिए पाक और मुकद्दस है और यहां राम का मंदिर ही बनना चाहिए, लेकिन कांग्रेसी मौलानाओं का एक बड़ा तबका अब भी इसे हिंदुओं का अपमान करने और उन्हें चिढ़ाने के लिए इस्तेमाल कर रहा है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने हमेशा इसे राष्ट्रीय अस्मिता का प्रतीक माना। यही वजह है कि इसके सहयोगी संगठन विश्व हिंदू परिषद ने राम मंदिर के निर्माण का बीड़ा उठाया। भारतीय जनता पार्टी ने सदा इसे अपने चुनाव घोषणापत्र में स्थान दिया। जिस प्रकार नरेंद्र मोदी स्पष्ट बहुमत के साथ प्रधानमंत्री बने, उससे आजाद भारत के इतिहास में कोटि-कोटि हिंदुओं के मन में पहली बार ये आशा जगी कि वो अवश्य इस मसले को हल कर देंगे। लेकिन इसके लिए कानून लाने की जगह उन्होंने इस विषय में सुप्रीम कोर्ट में चल रहे मुकदमे के फैसले का इंतजार करने का निर्णय लिया। एक बारगी लगा भी कि सुप्रीम कोर्ट इस विषय में जल्द फैसला सुना देगा, लेकिन उसने इसे जनवरी तक टाल दिया।

देशद्रोही नक्सलियों और कश्मीरी आतंकवादियों के लिए रात-रात भर जगने वाले सुप्रीम कोर्ट के इस टरकाऊ रवैये से हिंदू समाज क्षुब्ध है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और विश्व हिंदू परिषद अब इस विषय में व्यापक जनजागरण अभियान चला रहे हैं। इसी संदर्भ में नौ दिसंबर को दिल्ली के रामलीला मैदान में जुटे लाखों रामभक्तों ने एक बार फिर मोदी सरकार को आगाह किया कि वो इस महत्वपूर्ण मसले को नजरअंदाज न करे और इस विषय में जल्द से जल्द कानून बनाए। संघ के सरकार्यवाह भय्या जी जोशी ने सही कहा है कि इस विषय में कानून की मांग कर कोई भीख नहीं मांगी जा रही। राम मंदिर भले ही अब भाजपा नेताओं को चुनावी मुद्दा न लगता हो परंतु विश्व हिंदू परिषद के आंदोलन और फिर लालकृष्ण आडवाणी की रामरथ यात्रा ने लोगों को बड़ी संख्या में जागरूक किया और अपनी अस्मिता का अहसास करवाया जिसका भाजपा को लाभ भी मिला।

संघ और संत समाज के स्पष्ट मत के बाद अपेक्षा की जानी चाहिए कि प्रधानमंत्री मोदी राष्ट्रीय अस्मिता के इस महत्वपूर्ण विषय पर संसद के शीतकालीम सत्र में कानून बनवाएंगे। भारतीय जनता पार्टी के राज्य सभा सांसद राकेश सिन्हा इस विषय में निजी विधेयक की बात भी कर रहे हैं, लेकिन मोदी को अब इसे हलके में नहीं लेना चाहिए। उनकी सरकार के पास सीमित समय बचा है। उन्हें चाहिए कि वो अपने इस ऐतिहासिक सांस्कृतिक दायित्व को अविलंब पूरा करें।

निःसंदेह भारतीय लोकतंत्र में संसद सर्वोच्च है। जब सरकार अनुसूचित जाति-जनजाति अधिनियम पर सुप्रीम कोर्ट का निर्णय बदल सकती है तो राम जन्म भूमि मामले में उसके निर्णय के प्रतीक्षा करने का बहाना क्यों? वैसे भी ये बात ध्यान में रखनी चाहिए कि सुप्रीम कोर्ट में जमीन के स्वामित्व को लेकर मुकदमा चल रहा है, लेकिन हिंदुओं के लिए ये आस्था का प्रश्न है। उन्हें रामलला की उसी जगह पूजा करने और मंदिर बनाने का हक है जिसे वो राम जन्म भूमि मानते हैं।

हालिया विधानसभा चुनावों के दौरान भाजपा नेताओं ने बार-बार ये कहा कि उनके लिए ये चुनावी मुद्दा नहीं, आस्था का विषय है। सवाल ये है कि अगर ये चुनावी मुद्दा नहीं है तो इसे चुनाव घोषणापत्र में क्यों शामिल किया जाता है? जाहिर है, अब मोदी सरकार के पास सीमित समय बचा है। अगर वो इसे अभी नहीं हल करेगी तो कब करेगी? अगर भाजपा पूर्ण बहुमत के बावजूद इस मसले को हल नहीं करेगी तो आगामी चुनावों में वो किस मुंह से लोगों के बीच ये मुद्दा उठाएगी?

रेप पीड़ित के लिए कानून

हमारे भारत में यु तोह महिलाओ के अनेक क्षेत्रो में अग्रसर करने के लिए कई तरह के कदम उठाए जाते है। किन्तु कानूनी जानकारी से महिलाए अभी तक अनभिज्ञ है। अब हम रेप पीड़ित को ही ले यदि उससे पहले से ही अपने ऊपर हुए अत्याचार का सामनआ करने के लिए ये ज्ञात हो की किस प्रकार वह अन्याय के खिलाफ कदम उठाए या कानून से उससे किस प्रकार मदद मिल सकती तोह उससे एक मानसिक संबल प्राप्त होता है। …….
….. इन सब पहलुओ की जानकारी यदि किसी भी महिला को तो रपए पीड़िता अपने आत्मा सम्मान को पुनर्जीवित करने में समक्ष हो सकेगी।

  • Tolerance vs. Intolerance: The Manufactured Debate

हिन्दू परिवार व्यवस्था

विश्व में अनेक स्थानों पर विविध संस्कृतियों का जनम हुआ, विकास हुआ था विलय भी हुआ। मगर भारत में जिस संस्कृति का जनम हुआ उस हिन्दू संस्कृटिक अखंडित, अशवुनआ, प्रवाह, अनादि काल से आज तक बहता आ रहा है। इस सांस्कृति के निरंतरता का कारन है यहाँ की जीवनदाद्विती, जो त्रिषियो के चिंतन से प्राप्त अनुभवसिड्दर्शन पर आधारित है।
व्यक्तिगत विकास के साथ समाज हिट को भी ध्यान में रखने से व्यक्तित्व जीवन भी समृद्ध होता है और समाज की भी उत्पत्ति होती है। हर व्यक्ति ऐसा व्यहवहार करे इस दृष्टि से अपनी संस्कृति में चार पुरुषार्थ की संकल्पना की गयी है। वह चार पुरुषार्थ है धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष।

  • Intolerance vs. Tolerance: The Manufactured Debate

संपादकीय

हमारा देश “विविधता में एकता” का सबसे बड़ा उदाहरण है। यहाँ अलग-अलग जाती, धर्म, रीति – रिवाज़, संस्कृति, परंपरा और प्रथाओ को मानने वाले तथा भिन्न – -भिन्न भाषाओ को बोलने वाले लोग बिना किसी भेदभाव के रहते है , एक – दूसरे की मान्यताओ का सम्मान करते है और उनकी समझ भी रखते है।
भारत हज़ारो सालो से सहिष्णुता दीखता आ रहा है। वह अपने ऊपर हुए मुगलकालीन अत्याचारो जैसे – मुसलमानो द्वारा हिन्दुओ के साथ मारकाट मचाना, जजिया थोपना, हिन्दू धार्मिक स्थलों को नष्ट करना, हिन्दू स्त्रिकयों के साथ बलात्कार आदि सभी को कब का भुला चूका है और “जियो और जीने दो ” के सिद्धांत को अपनाकर निरंतर प्रगति के पथ पर अग्रसर है।

  • Tolerant India vs. Intolerant India: The Manufactured Debate

India is not an Intolerant Country

India, the world’s largest democracy, has inherently provided the right to free speech and opinion for all sections of the society within its constitution.

The opposition, the media and established writers are only focused on criticizing the present government and thus to the world. We, on the ground level know that this is not the case. We Indians live in harmony. It is very painful to see British and foreign media teaching us about human rights, when their own history does not support the humanely approach. India is on the rise and a whole lot of countries want to invest in India. To facilitate this, the media has to play a vital role. Our honorable Prime Minister was elected to office by the common consensus of the largest democracy in the world. Thus, our trust and respect in his judgment and efforts is mandatory to ensure the unhindered progress of our country.

  • Tolerant India vs. Intolerant India: The Manufactured Debate

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