हिन्दू परिवार व्यवस्था

विश्व में अनेक स्थानों पर विविध संस्कृतियों का जनम हुआ, विकास हुआ था विलय भी हुआ। मगर भारत में जिस संस्कृति का जनम हुआ उस हिन्दू संस्कृटिक अखंडित, अशवुनआ, प्रवाह, अनादि काल से आज तक बहता आ रहा है। इस सांस्कृति के निरंतरता का कारन है यहाँ की जीवनदाद्विती, जो त्रिषियो के चिंतन से प्राप्त अनुभवसिड्दर्शन पर आधारित है।
व्यक्तिगत विकास के साथ समाज हिट को भी ध्यान में रखने से व्यक्तित्व जीवन भी समृद्ध होता है और समाज की भी उत्पत्ति होती है। हर व्यक्ति ऐसा व्यहवहार करे इस दृष्टि से अपनी संस्कृति में चार पुरुषार्थ की संकल्पना की गयी है। वह चार पुरुषार्थ है धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष।

  • Intolerance vs. Tolerance: The Manufactured Debate
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