प्रागैतिहासिक काल व आधुनिक काल की उपलब्धियां : एक तुलनात्मक अध्ययन

 आज मानवजाति प्रगति के नए-नए स्तरों को पार करती जा रही है। उसकी मंजिल की कोई सीमा नहीं है। वह जितना आगे बढ़ रही है, उसकी प्रगति का मार्ग भी उतना ही विस्तृत हो रहा है। लगभग 50 वर्ष पूर्व मनुष्य जिन वस्तुओं की कल्पना भी नहीं कर सकता था, आज वही वस्तुएं विज्ञान की कृपा से उसके दैनिक जीवन का अनिवार्य अंग बन चुकी हैं। इन्टरनेट के द्वारा हम घर बैठे ही किसी भी क्षेत्र का ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। यही नहीं मंगल ग्रह पर की गई नई खोजों से प्राप्त विश्लेषणों ने तो मानव की प्रगति के कई अविश्वसनीय द्वार खोल दिए हैं। भविष्य में मानव के नए ग्रहों पर बसने की संभावना को देखते हुए विकसित देशों ने अंतरिक्ष में होटल बनाने की योजनाएं भी शुरू कर दी हैं। लेकिन कोई भी व्यक्ति चाहे वो कामयाबी की कितनी भी सीढ़ियां पार कर ले, अपने अतीत से नहीं भाग सकता। यदि हम अतीत में पीछे मुड़कर देखें और अपनी कामयाबी की तुलना पिछले युगों से करें तो हमें अपने आविष्कार नए प्रतीत नहीं होते बल्कि हमारे पूर्वजों के द्वारा प्रयोग में लाई गई वस्तुओं का ही एक हिस्सा लगते हैं।
     भारतीय इतिहास कितना ज्यादा उन्नत रहा है, ये हमारे वेदों, पुराणों, रामायण व महाभारत में साफ परिदर्शित होता है। लेकिन हमारा दुर्भाग्य है कि हमारे ही कुछ भाई लोग पाश्चात्य विचारधारा में बहकर अपने इस उन्नत इतिहास व रामायण और महाभारत में वर्णित कुछ विशेष उपलब्धियों को सिरे से नकार देते हैं। जबकि कड़वी सच्चाई यह है कि पाश्चात्य जगत अपने समाज को उन्नत करने के लिए हमारे वेदों, उपनिषदों व ऋषि मुनियों द्वारा वर्णित बातों का सहारा ले रहा है।
     प्रत्यक्ष उदाहरण हम रामसेतु के रूप में ले सकते हैं। जिस रामसेतु के अस्तित्व को साबित करने के लिए और उसे बचाने के लिए हमें अपने ही भाइयों से संघर्ष करना पड़ रहा है और सुप्रीम कोर्ट के दरवाज़े खटखटाये जा रहे हैं, उसी रामसेतु के अस्तित्व को अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी “नासा” अपनी रिसर्च से सही ठहराती है। इसे ही तो कहते हैं —– “दीया तले अँधेरा”। हम भारतीय अपने पूर्वजों द्वारा की गई खोजों व ज्ञान को स्वीकारना ही नहीं चाहते बल्कि हर ख़ोज के लिए विदेशों पर ही आश्रित रहना चाहते हैं। सच में….. गुलामी हमारी मानसिकता में जड़ों तक बस गई है।
      नवीन उदाहरण हम उत्तर प्रदेश के बागपत जिले के सिनौली गॉव में हुई खुदाई से ले सकते हैं, जहाँ पांच हजार वर्ष पूर्व के रथ, मुकुट और शस्त्र मिलते हैं जो कि इस बात को प्रमाणित करते हैं कि भारत का इतिहास कितना ज्यादा उन्नत था। साथ ही ये चिह्न महाभारत ग्रन्थ के अस्तित्व पर प्रश्न चिह्न लगाने वालों को भी करारा व प्रमाणित जवाब देते हैं।
     हमारे धर्मग्रंथों में कितने ही विरलयी आविष्कार छिपे पड़े हैं, जिनका वर्तमान में पुनः आविष्कार होने पर हम ख़ुशी से उछल पड़ते हैं। खास बात यह है कि पुरातन समय के आविष्कार किसी एक क्षेत्र विशेष से ही नहीं जुड़े हैं। यदि चिकित्सा विज्ञान में देखें तो सरोगेसी (किराये की कोख), क्लोनिंग, टेस्ट ट्यूब बेबी प्रक्रिया, अंग प्रत्यारोपण पध्दति, लिंग परिवर्तन प्रक्रिया जैसे मेडिकल रिसर्च को हम आधुनिक कामयाबी समझते हैं जबकि वास्तविकता तो ये है कि इन रिसर्चों का हमारे धर्म ग्रंथों में यूँ ही उल्लेख मिल जाता है।
  उदाहरणार्थ ….. कुंती व गांधारी द्वारा पांडवों व कौरवों का जन्म क्या टेस्ट ट्यूब बेबी प्रक्रिया को नहीं बताता या फिर रोहिणी की कोख से बलराम का जन्म सरोगेसी (किराये की कोख) की व्याख्या नहीं तो क्या है। महर्षि वाल्मीकि द्वारा कुश का जन्म जो कि लव के हूबहू थे, क्लोनिंग के सिद्धांत और पुरातन युग में उसके अस्तित्व को ही तो बताता है। भगवान श्री गणेश जी तो अपने आप में ही अंग प्रत्यारोपण पद्धति का साक्षात उदाहरण हैं और यह सिद्ध करते हैं कि पुरातन समय में हमारी चिकित्सा पद्धति कितनी ज्यादा उन्नत रही है। यही नहीं हमारे वेदों और पुराणों में कितनी ही बार जिक्र आता है कि समाज कल्याण के लिए हमारे देव अक्सर स्त्री रूप में प्रकट हुआ करते थे, क्या यह लिंग परिवर्तन प्रक्रिया का एक विशिष्ट उदाहरण नहीं है।
     चिकित्सा विज्ञान ही नहीं अन्य क्षेत्रों के आविष्कार की बात करें तो अभी तक हमारे आधुनिक वैज्ञानिकों के लिए टाइम मशीन का आविष्कार सिर्फ एक सपना है और इस विषय पर बहुत रिसर्च भी चल रही हैं, परन्तु हमारे धर्मग्रन्थ टाइम मशीन के अस्तित्व को हमेशा से स्वीकारते आये हैं तभी तो नारद मुनि का सतयुग, त्रेता युग, और द्वापर युग में आवागमन टाइम मशीन के बिना क्या संभव हो पाता? धर्मग्रंथों में उल्लेख मिलता है कि रावण पुष्पक विमान द्वारा सीता जी को लंका ले गया था। क्या वह पुष्पक विमान आज के हवाई जहाज या हैलीकॉप्टर का ही एक रूप था? इसी प्रकार 15वीं सदी में संजय द्वारा धृतराष्ट्र को महाभारत युद्ध का आँखों देखा वर्णन सुनाना किसी टी.वी. चैनल द्वारा प्रसारित सीधा प्रसारण नहीं लगता है? प्राचीन समय के युद्धों में ब्रहमास्त्र के प्रयोग का वर्णन मिलता है, यह ब्रहमास्त्र जिसके पास होता था वह अत्यंत ताकतवर समझा जाता था व उसकी जीत सुनिश्चित होती थी। क्या उसी ब्रहमास्त्र का नाम इस युग में परमाणु शस्त्र है?
     इसी प्रकार विभिन्न धर्मग्रंथों में स्वर्ग, पाताल, नक्षत्र इत्यादि लोकों का वर्णन मिलता है। क्या ये विभिन्न लोक हमारे सौर मंडल के ही विभिन्न ग्रह थे? जहाँ पर कभी जीवन रहा हो और उन ग्रहों के जीव पृथ्वी के मानवों से अधिक ताकतवर व सुविधासंपन्न रहे हों, जिस कारण पृथ्वीवासियों ने उन्हें देवताओं की संज्ञा दी हो। पुराने समय में ऋषि मुनि आकाशमार्ग द्वारा विभिन्न लोकों पर आ जा सकते थे। इस युग में भी मनुष्य विभिन्न जेट विमानों के द्वारा दूसरे ग्रहों पर पहुँच रहा है। धर्मग्रंथों के अनुसार स्वर्ग का एक दिन पृथ्वी के कई वर्षों के समान था। यदि हम अपने सौर मंडल के दो ग्रहों की आपस में तुलना करें तो लगभग इसी तरह के निष्कर्ष प्राप्त होते हैं।
      उदाहरणार्थ ……पृथ्वी पर 365 दिन का एक वर्ष होता है, जबकि बुद्ध ग्रह पर 88 दिन का एक वर्ष होता है। अतः धर्मग्रंथों में जिस स्वर्ग लोक का उल्लेख मिलता है, क्या वह इन्हीं ग्रहों में से एक था?
     इसी तरह धर्मग्रंथों में ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं जो कि ये सोचने पर मजबूर कर देते हैं कि आज के आविष्कार हमारे पूर्वजों द्वारा प्रयोग में लाई गई वस्तुओं का ही एक रूप हैं। तो क्या प्राचीन काल में हमारे पूर्वज उन सभी रहस्यों को जान चुके थे, जिन रहस्यों की परतें धीरे धीरे इस युग में खोली जा रहीं हैं। उपर्युक्त कुछ तथ्यों को देखने से क्या यह निष्कर्ष नहीं निकलता है कि हम धीरे धीरे धार्मिक ग्रंथों में वर्णित युगों की ओर जा रहे हैं। क्या वास्तव में यह युग एक संक्रमण काल की भूमिका अदा कर रहा है?
     जब लाखों वर्षों बाद हमारा सूर्य अपनी आयु पूरी करेगा और पृथ्वी का जीवन संकट में आयेगा, उस समय हमारी भावी पीढ़ी के पास दूसरे ग्रहों पर बसने के अलावा और कोई विकल्प नहीं होगा। उस समय तक हमारे पास इतने साधन विकसित हो चुके होंगे कि हम विभिन्न ग्रहों पर जीवन का विकास कर लेंगे। तब शायद उनमें से कोई ग्रह स्वर्गलोक, कोई पाताल लोक, कोई गंधर्व लोक या कोई नक्षत्र लोक की भूमिका अदा करेंगे। यदि हम धर्मग्रंथों में वर्णित युग और इस युग की उपलब्धियों का विश्लेषण करें तो हमें दोनों युगों के आविष्कारों में कोई विशेष अंतर दिखाई नहीं पड़ता है। फर्क सिर्फ इतना है कि ये धर्म ग्रंथ हजारों साल पहले लिखे गए हैं। तो क्या वास्तव में उस समय का मानव आज के मानव से अधिक बुद्धिमान और सफल था? और किन्हीं कारणों वश हमने अपने पूर्वजों द्वारा किये गए रिसर्च व अविष्कारों को खो दिया है और अब पुनः आविष्कार के द्वारा इतिहास अपने आप को दोहरा रहा है।
     लेकिन राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हमारे कुछ बुद्धिजीवी गण विदेशी चश्मा लगाकर हिन्दू धर्मग्रंथों में वर्णित घटनाक्रम पढ़ते हैं और फिर इधर उधर बगलें झाँकते हुए हिन्दू धर्मग्रन्थों को काल्पनिक करार देकर अपनी पीठ खुद ही थपथपाने लगते हैं। सही कहा गया है कि इतिहास वर्तमान का निर्माण करता है और भारतीय पुरातन इतिहास को हम कुछ लोगों की कपोल-कल्पित बातों से हलके में नहीं ले सकते। अब समय आ गया है कि हिन्दू धर्मग्रंथों में उल्लेखित आविष्कारों का गहन अध्ययन किया जाये। वास्तव में अभी इस दिशा में गहरे शोध कार्य की जरूरत है।
                                 डॉ गुंजन अग्रवाल
                               दिल्ली विश्वविद्द्याल
                                      (अर्थशास्त्र)
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