जब मोदी मुकाबिल हो तो अफवाह फैलाओ

जब मोदी मुकाबिल हो तो अफवाह फैलाओ in ‘Punjab Kesari’

अकबर इलाहाबादी का शेर है – खींचो न कमानों को न तलवार निकालो, जब तोप मुकाबिल हो तो अखबार निकालो। जिस तरह कांग्रेसी मीडिया और कुछ अन्य विपक्षी दल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार के खिलाफ अफवाहें फैला रहे हैं, उससे हमें इस शेर की पैरोडी सूझ रही हैः

खींचो न कमानों को न तलवार निकालो,  जब मोदी मुकाबिल हो तो अफवाह फैलाओ

अफवाहों का ये सिलसिला नया नहीं है। ये अवश्य है कि आगामी लोकसभा चुनावों को देखते हुए अब इसने गति पकड़ ली है। मोदी के प्रधानमंत्री पद की शपथ लेते ही कट्टरपंथी इस्लामिक-नक्सली गैंग ने ‘असहिष्णुता’ राग छेड़ दिया था। इसके अनेक सदस्य जो भ्रष्ट कांग्रेस राज में मलाई खा रहे थे और जिनकी पांचों उंगलियां घी में और सिर कढ़ाई में थे, मोदी राज में अनाथ हो गए। उनके राजनीतिक आका ही सड़क पर नहीं आए, उनकी खुद की दुकानें और विदेशी दौरे भी बंद हो गए। इनमें से अनेक तो ऐसे नक्सली भी थे जिनकी सोनिया गांधी की नेशनल एडवाइजरी काउंसिल में सीधी पहुंच थी। कांग्रेस राज में नेशनल हेरल्ड, टूजी, सीडब्लूजी, अगुस्ता वेस्टलेंड से लेकर न जाने कितने घोटाले सामने आए, कितनी ही जमीनें गांधी परिवार ने देश के अलग-अलग हिस्सों में अपनी संस्थाओं के नाम पर हड़पीं, राष्ट्रीय दामाद राॅबर्ट वाड्रा तक के दसियों घोटाले सामने आए जिनकी कीमत खरबों रूपए में थी। लेकिन कांग्रेस राज में घी पीने वाले इन अंधभक्तों ने कभी किसी घोटाले के खिलाफ आवाज नहीं उठाई, जनता का पैसा लुटता रहा, मगर इनका दिल नहीं पसीजा।

मोदी के आते ही इनका ‘जमीर’ जागृत हो गया, इन्हें हर तरफ असहिष्णुता नजर आने लगी। कांग्रेस राज में हिंसा कहीं ज्यादा होती थी। तब तो बाकायदा हिंदुओं को आतंकवादी साबित करने का षडयंत्र तक किया गया, लेकिन तब इन्हें कोई ‘असहिष्णुता’ नजर नहीं आई। मोदी के आते ही मुस्लिमों के खिलाफ हुई गिनी-चुनी घटनाओं को राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऐसे पेश किया जाने लगा जैसे भारत में तबाही आ गई हो और इसके 20 करोड़ मुसलमान त्राही-त्राही कर रहे हों। ये मोदी सरकार के खिलाफ अफवाह फैलाने की पहली बड़ी साजिश थी। इसमें पाकिस्तान से लेकर अमेरिका तक फैले इनके भारत विरोधी नेटवर्क ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया और मोदी सरकार की छवि कलूषित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। इन अफवाहों का मकसद एक तीर से दो शिकार करना था – मोदी सरकार की छवि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दागदार करना और मुसलमानों में हिंदुओं के प्रति नफरत और डर पैदा कर उनका ध्रुवीकरण सुनिश्चित करना।

हमने देखा जब कश्मीरी आतंकवादी और संसद पर हमले के आरोपी अफजल गुरू की याद में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में टुकड़े-टुकड़े गैंग ने भारत की बर्बादी और उसे तोड़ने के नारे लगाए, तो असहिष्णुता की बात करने वाला ये पूरा कट्टरपंथी इस्लामिक-नक्सली गैंग नारे लगाने वालों के समर्थन में लामबंद हो गया और देशद्रोहियों पर कार्रवाई को अभिव्यक्ति की आजादी का उल्लंघन बताने लगा। राहुल गांधी, अरविंद केजरीवाल, सीताराम येचुरी…वहां लगभग पूरा गैंग मौजूद था। आश्चर्य की बात तो ये है कि वहां जिसके दिल में जो आया, उसने कहा फिर भी सरकार पर आरोप लगाया कि सरकार अभिव्यक्ति की आजादी पर रोक लगाा रही है। राहुल गांधी ने तो मोदी के खिलाफ जो अनर्गल प्रलाप किया वो सब जानते हैं, अगर बोलने पर रोक होती तो क्या राहुल और उनका गैंग ऐसे अपशब्दों का प्रयोग कर पाते? सोनिया ने मोदी को मौत का सौदागर बोला तो राहुल मोदी को नफरत फैलाने वाला बता दिया। अगर देश में बोलने की आजादी पर रोक होती तो क्या राहुल की बेलगाम जबान ऐसे चल रही होती? हकीकत तो ये है कि राहुल और कांग्रेस का मीडिया सेल अफवाहों की दुकान बन गए हैं, जो जिसके मन में आ रहा है, बोल रहा है।

कांग्रेसी वकील अभिषेक मनु सिंघवी सुप्रीम कोर्ट में अर्बन नक्सलियों का मुकदमा लड़ते हैं और कपिल सिब्बल पूर्व में सिमी और अब पाॅपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया का। मीडिया में कांग्रेसी प्रवक्ता इन देशद्रोहियों की ढाल बनते हैं और फिर आश्चर्य राहुल गांधी मोदी, भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर नफरत फैलाने का आरोप लगाते हैं। ये निरी अफवाह नहीं तो और क्या है? आश्चर्य नहीं कि ये पूरा मसला मुसलमानों के एक वर्ग की हिंदू विरोधी भावना भड़का कर वोट बटोरने का है। इन लोगों ने देश पर इतने साल शासन किया लेकिन कभी मुसलमानों को ये नहीं कहा कि उन्हें अपने धर्म से पहले देश के संविधान को मानना होगा। मोदी कहते हैं मेरा धर्म संविधान है और संसद मेरा मंदिर। प्रधानमंत्री के तौर पर उन्होंने इसे पूरी तरह निभाया। दुखद है कि नक्सलियों और इस्लामिक आतंकियों का समर्थन करने वाले आज ये कह रहे हैं कि उन्हें संविधान की रक्षा के लिए मोदी से छुटकारा चाहिए। ऐसे लोगों से एक छोटा परंतु बड़ा सवाल – जब नक्सली देश के 20 प्रतिशत भूभाग पर कब्जा कर रहे थे, तब ये कहां सो रहे थे?

मोदी सरकार के खिलाफ दूसरी बड़ी अफवाह फैलाई बहुजन समाज पार्टी अध्यक्ष मायावती ने। लोकसभा के बाद जब विधानसभा चुनाव भी वो बुरी तरह हारीं तो उन्होंने सारा ठीकरा इलैक्ट्रोनिक वोटिंग मशीनों (ईवीएम) के सिर फोड़ दिया। इसके बाद समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव, आम आदमी पार्टी अध्यक्ष अरविंद केजरीवाल से लेकर राहुल गांधी तक सब इस कोरस में शामिल हो गए। केजरीवाल ने इस विषय में दिल्ली विधानसभा का विशेष सत्र तक बुला लिया। सुप्रीम कोर्ट में ईवीएम के खिलाफ याचिका तक दायर की गई लेकिन वहां भी कुछ हासिल नहीं हुआ। ईवीएम धारावाहिक का ताजा ऐपीसोड हमने हाल ही में लंदन में देखा जहां कांग्रेसी नेता कपिल सिब्बल की सरपरस्ती में एक कथित नकाबधारी हैकर सयद शुजा ने ईवीएम को लेकर बिना किसी सबूत के बेसिरपैर के आरोप लगाए। जब वहां मौजूद लोगों ने उससे सबूत मांगा तो वो बिना जवाब दिए वहां से खिसक लिया। जाहिर है विधि मंत्री रविशंकर प्रसाद ने ही नहीं, चुनाव आयोग ने भी इसका कड़ा विरोध किया। कांग्रेसी नेताओं को विदेशी धरती पर ऐसी हरकतें करते शर्म भी नहीं आई। उन्होंने निष्पक्ष चुनाव आयोग का ही नहीं, अपने लोकतंत्र और उसकी सम्मानित संस्थाओं का अपमान भी किया। वैसे भी देखने में यही आ रहा है कि कांग्रेस अब मोदी विरोध में इतनी अंधी हो गई है कि उसके लिए लोकतंत्र की सभी संस्थाएं और उनका गौरव नगण्य हो गया है। उसे ये समझ में नहीं आ रहा कि वो अपनी आत्मघाती हरकतों से अपना ही नहीं, देश का भी कबाड़ा कर रही है। वैसे जब राहुल गांधी खुद विदेशों में देश की लोकतांत्रिक सरकार का अपमान करते रहे हों और सारा प्रोटोकोल ताक पर रख विदेशियों से छुप-छुप कर मिलते रहे हों तो उनकी पार्टी भी अगर विदेश में ऐसे कार्यक्रम करे तो क्या आश्चर्य। आपको याद दिला दें कि अगर लंदन में कपिल सिब्बल मौजूद थे तो दिल्ली में प्रेस क्लब में नक्सली जिग्नेश मेवानी के कार्यक्रम में राहुल के दाएं हाथ अलंकार खुद उपस्थित थे। भीमा कोरेगांव के बाद महाराष्ट्र पुलिस द्वारा दायर चार्जशीट में भी कांग्रेस और जिग्नेश मेवानी का संपर्क सामने आ चुका है।

कांग्रेस, मोदी विरोध में किस कदर अंधी हो गई है, इसका उदाहरण हमें जज लोया मामले में देखने को मिला। इस मामले में कांग्रेसी वकीलों ने तबके मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के खिलाफ अदालत में ही अपशब्दों का प्रयोग किया। ये लोग उनपर दबाव बना रहे थे कि वो जज लोया की प्राकृतिक मृत्यु को हत्या करार दें ताकि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को फंसाया जा सके जिनसे जुड़े एक मामले की वो सुनवाई कर रहे थे। न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा के खिलाफ तो कांग्रेसी महाभियोग प्रस्ताव तक ले आए। कहा तो ये तक जाता है कि कांग्रेसी वकीलों ने दीपक मिश्रा पर दबाव बनाया ताकि वो राम मंदिर मामला टाल दें। न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा के कार्यकाल में जैसे चार न्यायाधीशों (जे चेलमेश्वर, रंजन गोगोई, एम बी लोकुर, कुरियन जोसेफ) ने संवाददाता सम्मेलन किया और जैसे मुख्य न्यायाधीश पर आरोप लगाए, उससे भी न्यायपालिका के राजनीतिकरण का अंदेशा हुआ था। न्यायाधीशों की प्रेसवार्ता के ठीक बाद न्यायमूति चेलमेशवर के घर कम्युनिस्ट पार्टी आॅफ इंडिया के नेता डी राजा का जाना और क्या संकेत देता है?

कांग्रेस अगर अफवाहों का धंधा अदालत तक रखती तब भी गनीमत होती। लेकिन राफेल को लेकर उसने जैसे देश की रक्षा के साथ खिलवाड़ किया वो अक्षम्य है। कांग्रेस ने मनमोहन सरकार के दस वर्ष के शासन में इस सौदे के साथ खिलवाड़ किया जबकि वायुसेना ने इसे देश की रणनीतिक तैयारी की दृष्टि से अनिवार्य बताया था। जब मोदी सरकार ने देश की रक्षा में इसके महत्व को देखते हुए इसे अंजाम तक पहुंचा दिया तो कांग्रेस ने आसमान सर पर उठा लिया और अफवाहों का बाजार गर्म कर दिया। इन अफवाहों के भी दो मकसद थे – मोदी सरकार को बदनाम करना और जैसा कि रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण कहती हैं, प्रतिद्वद्वी कंपनियों का हित साधना। इस मामले में उंगली एक बार फिर राॅबर्ट वाड्रा और उनके दलाल मित्र संजय भंडारी की ओर उठी। कहा तो ये तक गया कि राफेल बनाने वाली कंपनी दासो ने वाड्रा की बात मानने से इनकार किया, इसीलिए मनमोहन सरकार ने ये डील अंतिम चरण में रद्द की। रक्षा मामलों में एक और मामला है जिसमें कांग्रेस ने भ्रम फैलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। ये मामला है सर्जिकल स्ट्राइक का। राहुल गांधी ने इसे खून की दलाली बताया तो केजरीवाल इसके सबूत मांगने लगे। आश्चर्य नहीं कि दोनों के बयानों का भारत से ज्यादा पाकिस्तान में स्वागत हुआ।

कांग्रेसी जुमलेबाजी और अफवाहों के हजारों उदाहरण है, लेकिन चलते चलते सीबीआई की बात करना जरूरी है। आलोक वर्मा को सीबीआई निदेशक बनाने का पहले तो कांग्रेस ने विरोध किया, लेकिन फिर ऐसा क्या हो गया कि कांग्रेस उन्हें बचाने के लिए जी जान से जुट गई। सुप्रीम कोर्ट ने उनके कार्यकाल के बारे में कोई भी निर्णय चयन समिति पर छोड़ दिया जिसमें प्रधानमंत्री, मुख्य न्यायाधीश और नेता प्रतिपक्ष होते हैं। कोर्ट के आदेश के बाद जब इसकी बैठक हुई तो विपक्षी नेता मल्लिकाजुन खड़गे ने उन्हें बचाने में कोई कसर नहीं छोड़ी, लेकिन जब प्रधानमंत्री और मुख्य न्यायाधीश के प्रतिनिधि न्यायमूर्ति ए के सीकरी ने उन्हें हटाने का फैसला किया तो कांग्रेसी मीडिया सीकरी को ही बदनाम करने में लग गया। उनके खिलाफ अफवाहें फैलाई जाने लगीं कि उन्होंने सेवानिवृत्ति के बाद इंग्लैंड में मलाईदार पद के लिए मोदी का साथ दिया। जबकि वास्तविकता ये है कि चयन समिति की बैठक जनवरी में हुई और इंग्लैंड में पोस्टिंग के लिए उनका नाम दिसंबर में ही तय किया जा चुका था।

कांग्रेस ने अपने हित साधन के लिए जैसे देश की लोकतांत्रिक संस्थाओं का दुरूपयोग किया और उन्हें बदनाम किया, वो शर्मनाक ही नहीं, निंदनीय भी है। अब तो ये पार्टी अफवाहों से आगे बढ़ कर धमकाने में भी लग गई है। हाल ही में जब सीबीआई ने हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपिंदर हुड्डा के जमीन घोटालों के सिलसिले में उनके घर पर छापा मारा तो कांग्रेस प्रवक्ता ने बाकायदा उसके अफसरों को धमकाया कि अब चुनाव का कुछ ही समय बाकी है, इसके बाद सभी अफसरों का हिसाब किया जाएगा।

प्रधानमंत्री मोदी, संघ के खिलाफ अफवाहें फैलाना, खुद देश तोड़ने वालों का साथ देना और भाजपा पर देश तोड़ने का आरोप लगाना, मुख्य न्यायाधीश से लेकर चुनाव आयोग और सीबीआई तक सभी संस्थाओं को धमकाना, गांधी परिवार के भ्रष्टाचार में आंकठ डूबे होने के बावजूद बिना सबूत मोदी पर कीचड़ उछालना, ये कांग्रेस की बौखलाहट और झल्लाहट है या सोची समझी रणनीति या बौखलाहट में बनाई गई रणनीति, चाहे कुछ भी हो, एक बात तो स्पष्ट है कि कांग्रेस जनता को लंबे अर्से तक मूर्ख नहीं बना पाएगी। कांग्रेस भले ही कितना दुष्प्रचार करे, उसे ये समझना होगा कि ये पब्लिक है ये सब जानती है, उसे अफवाहों और असलियत का अंतर मालूम है।

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